British हुकूमत में कविता प्रकाशन पर प्रतिबंध था, कविता छापने पर कृष्‍णकांत मालवीय को Prayagraj में मिली थी सजा

मदन मोहन मालवीय के भतीते कृष्‍णकांत पर कविता प्रकाशित करने को लेकर राजद्रोह का केस चला था।

मिश्र बताते हैं कि दो दिसंबर 1931 को कृष्णकांत मालवीय ने अभ्युदय में मऊ (झांसी) के घासी राम व्यास की तीन कविताएं इंकलाब जिंदाबाद खटके एवं पीठ दिखैयो नहीं छापी। सरकार ने इसे राजद्रोह मानते हुए उन पर मुकदमा चलाया।

Brijesh SrivastavaSun, 28 Feb 2021 07:59 AM (IST)

प्रयागराज, जेएनएन। आजादी के पहले प्रयागराज में क्रांतिकारियों की कविताओं के छापने पर भी ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिबंध लगा रखा था। इन कविताओं को छपने पर इसे राजद्रोह माना जाता था। कविता छापने वालों पर मुकदमा चलता था और सजा सुनाई जाती थी। ऐसा ही एक मामला उस जमाने के प्रख्यात पत्रकार कृष्णकांत मालवीय के साथ हुआ था। एक कवि की तीन कविता छापने पर उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ था।

मदन मोहन मालवीय के भतीजे थे कृष्णकांत

वरिष्ठ पत्रकार नरेश मिश्र बताते हैं कि कृष्णकांत मालवीय का जन्म जून 1893 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। वे महामना मदनमोहन मालवीय के बड़े भाई जयकृष्ण मालवीय के पुत्र थे। पत्रकारिता एवं राजनीति के क्षेत्र में वे महामना के अनन्य अनुयायी थे। उनकी बीए तक की पढ़ाई प्रयागराज में हुई थी। उन्होंने 1910 मेंं अभ्युदय साप्ताहिक का संपादन संभाला था। यह साप्ताहिक 1907 में वसंत पंचमी के दिन महामना मदनमोहन मालवीय ने शुरू किया था। कृष्णकांत मालवीय ने दो दशकों तक इसका संपादन करके इसे बुलंदी में पहुंचाया था। अभ्युदय विशुद्ध राजनीतिक पत्र था। वे इस पत्र में राजनीतिक लेख के अतिरिक्त साहित्यिक तथा सामाजिक विषयों पर भी विचारपूर्ण लेख प्रकाशित करते थे।

चार बार गए थे जेल

नरेश मिश्र बताते हैं कि कृष्णकांत मालवीय ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया था। वे 1920 से 1931 के मध्य चार बार करीब ढाई वर्ष के लिए जेल गए। वे कांग्रेस के टिकट पर इलाहाबाद म्यूनिसिपैल्टी के सदस्य भी चुने गए थे। उन्होंने 1911 से 1922 तक मर्यादा नामक मासिक पत्रिका का भी संपादन किया था।

इलाहाबाद के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट मोहनलाल श्रीवास्तव ने मुकदमे की सुनवाई की थी

मिश्र बताते हैं कि दो दिसंबर 1931 को कृष्णकांत मालवीय ने अभ्युदय में मऊ (झांसी) के घासी राम व्यास की तीन कविताएं 'इंकलाब जिंदाबाद', 'खटके' एवं 'पीठ दिखैयो नहीं' छापी। सरकार ने इसे राजद्रोह मानते हुए उन पर मुकदमा चलाया। कृष्णकांत मालवीय की तरफ से वेंकटेश नारायण तिवारी, पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा श्याम मोहन ने गवाही दी। उस समय इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट मोहनलाल श्रीवास्तव ने मुकदमे की सुनवाई की। तब प्रदेश के मुख्य सचिव ने उन्हें मुकदमा सुनने के लिए अधिकृत किया था। 16 फरवरी 1932 को ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ने कृष्णकांत का सजा सुनाई। जुर्माने की राशि की वसूली के लिए कृष्णकांत मालवीय के घर का कुछ सामान कुर्क कर लिया गया, जिसमें धोती, कुर्ता, पायजामा, कुर्सी, मेज आलमारी आदि था।

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