Birth Anniversary: हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला को सरस्वती से मिला 'अमरत्व'

Birth Anniversary Harivansh Rai Bachchan डा. हरिवंश ने 50 से अधिक कृतियां लिखी थी लेकिन पहचान मधुशाला ने दिलाई। सरस्वती के दिसंबर 1933 के अंक में प्रकाशित होकर मधुशाला लोकप्रियता के चरम पर पहुंच गई। इसके साथ बच्चन साहित्यजगत में स्थापित हो गए।

Ankur TripathiPublish:Sat, 27 Nov 2021 07:20 AM (IST) Updated:Sat, 27 Nov 2021 07:20 AM (IST)
Birth Anniversary: हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला को सरस्वती से मिला 'अमरत्व'
Birth Anniversary: हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला को सरस्वती से मिला 'अमरत्व'

शरद द्विवेदी, प्रयागराज। गंगा-यमुना व अदृश्य सरस्वती की त्रिवेणी (संगम) के पवित्र जल में डुबकी लगाकर हर प्राणी अमरत्व प्राप्ति की संकल्पना का साकार करना चाहता है। यही चाह देश-विदेश के श्रद्धालुओं को तपस्थली प्रयागराज की धरा पर खींच लाती है। उन्हें अमरत्व मिलता है या नहीं? ये चर्चा का विषय हो सकता है, लेकिन प्रयागराज की धरा से प्रवाहमान (प्रकाशित) ज्ञानरूपी ''सरस्वती'' पत्रिका ने अनेक रचनाकारों को अमर कर दिया।

सरस्वती के दिसंबर 1933 के अंक में प्रकाशित हुई थी मधुशाला

महानायक अमिताभ बच्चन के पिता पद्मभूषण डा. हरिवंश राय बच्चन उन्हीं रचनाकारों में शामिल हैं। डा. हरिवंश ने 50 से अधिक कृतियां लिखी थी, लेकिन पहचान ''मधुशाला'' ने दिलाई। सरस्वती के दिसंबर 1933 के अंक में प्रकाशित होकर मधुशाला लोकप्रियता के चरम पर पहुंच गई। इसके साथ बच्चन साहित्यजगत में स्थापित हो गए।सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित होने के बाद मधुशाला की उक्त पंक्तियां साहित्यजगत में चर्चा का केंद्र बन गईं।

साहित्यिक चिंतक व्रतशील शर्मा बताते हैं कि ठाकुर श्रीनाथ सिंह ने सरस्वती पत्रिका के प्रधान संपादक पं. देवीदत्त शुक्ल के सामने बच्चन की कृति मधुशाला को प्रस्तुत करके बताया कि अंग्रेजी के प्राध्यापक होते हुए भी उन्होंने हिंदी काव्यानुराग के कारण ''मधुशाला'' जैसी अनूठी कृति की रचना की है। इससे पं. देवीदत्त काफी प्रभावित हुए। उन्होंने मधुशाला के 20 छंदों का चयन कर पत्रिका में प्रकाशित करने की सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी। यहीं नहीं, प्रोत्साहनपरक संपादकीय टिप्पणी करते हुए लिखा था, ''हिंदी में इधर कुछ समय से उमर खयाम के ढंग पर रूबाइयां भी लिखी जाने लगी हैं। श्रीयुत हरवंशराय बी.ए. ने इस दिशा में विशेष सफलता प्राप्त की है। इन्होंने 108 बड़ी सुंदर रुबाइयां लिखी हैं, उनमें से कुछ यहां दी जाती हैं।'' इसके बाद बच्चन और मधुशाला एक तरह से एकाकार से हो गए। लोकप्रियता मिलने पर बच्चन ने आगे चलकर ''मधुशाला'' को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। सरस्वती पत्रिका के सहायक संपादक अनुपम परिहार कहते हैं कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं. देवीदत्त शुक्ल जैसे अनेक संपादकों ने नए रचनाकारों को प्रोत्साहित करते थे। पं. देवीदत्त ने उसी कारण मधुशाला को प्रकाशित किया। धार्मिक स्वभाव होने के बावजूद उन्होंने मधुशाला को सामाजिक समरसता के रूप में देखा था।

कर्मस्थली रही प्रयागराज

वरिष्ठ कथाकार डा. कीर्ति कुमार सिंह बताते हैं कि 27 नवंबर 1907 को प्रतापगढ़ के बाबूपट्टी गांव में जन्मे हरिवंश राय बच्चन की कर्मभूमि प्रयागराज थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी का शिक्षक होने के साथ उन्हें यहीं से साहित्यिक पहचान मिली। उन्होंने 1929 में तेरा हार, 1935 में मधुशाला, 1936 में मधुबाला, 1937 में मधुकलश, आत्म परिचय सहित 26 रचनाएं लिखी, जबकि 1969 में लिखी गई उनकी आत्मकथा ''क्या भूलूं क्या याद करूं'' काफी चर्चित रही। मुंबई में 18 जनवरी 2003 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

प्रतिमा न लगना कष्टकारी : प्रो. फातमी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पूर्व उर्दू विभागाध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. अली अहमद फातमी कहते हैं कि डा. हरिवंश राय बच्चन प्रयागराज ही नहीं पूरे देश की विभूति हैं। प्रयागराज उनकी कर्मस्थली रही है। इसके बावजूद शहर में उनकी प्रतिमा न होना कष्टकारी है। इवि अथवा शहर के किसी प्रमुख स्थल पर उनकी प्रतिमा लगनी चाहिए, जिससे भावी पीढ़ी खुद को बच्चन से जोड़ सके।