इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश, बहू को बेटी से ज्यादा अधिकार; आश्रित कोटे नियम बदले सरकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि बहू को आश्रित कोटे में बेटी से ज्यादा अधिकार है। यह फैसला सस्ते गल्ले के लाइसेंस धारक की मौत पर वारिसों को दुकान आवंटन में भी लागू होगा। कोर्ट ने सरकार के आदेश को रद करते हुए इसमें बदलाव का निर्देश दिया है।

Umesh TiwariMon, 06 Dec 2021 06:54 PM (IST)
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि बहू को आश्रित कोटे में बेटी से ज्यादा अधिकार है।

प्रयागराज, जेएनएन। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लाइसेंस धारक की मौत पर वारिसों को सस्ते गल्ले की दुकान के आवंटन मामले में पुत्रवधू (विधवा या सधवा) को परिवार में शामिल करने के लिए राज्य सरकार को निर्देश दिया है। पुत्री को परिवार में शामिल करने तथा बहू को परिवार में शामिल न करने के पांच अगस्त, 2019 को सचिव खाद्य एवं आपूर्ति द्वारा जारी शासनादेश के पैरा-4 (10) व बहू होने के नाते दुकान का लाइसेंस देने से इन्कार करने के जिला आपूर्ति अधिकारी के 17 जून, 2021 के आदेश को विधि विरुद्ध करार देते हुए रद कर दिया है।

हाई कोर्ट ने यूपी पावर कार्पोरेशन केस में पूर्णपीठ के फैसले के आधार पर सचिव खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति को नया शासनादेश जारी करने अथवा शासनादेश को ही चार हफ्ते में संशोधित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति नीरज तिवारी ने पुष्पा देवी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।

इस फैसले में पूर्णपीठ ने कहा है कि बहू को आश्रित कोटे में बेटी से ज्यादा अधिकार है। यह फैसला इस मामले में भी लागू होगा। कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव व प्रमुख सचिव खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति को आदेश अनुपालन की जिम्मेदारी दी है। कोर्ट ने जिला आपूर्ति अधिकारी को नया शासनादेश जारी होने या संशोधित किए जाने के दो सप्ताह में याची को वारिस के नाते सस्ते गल्ले की दुकान का लाइसेंस देने पर विचार करने का निर्देश दिया है।

बता दें कि याची की सास के नाम सस्ते गल्ले की दूकान का लाइसेंस था, जिनकी 11 अप्रैल, 2021 को मौत हो गई। याची के पति की पहले ही मौत हो चुकी थी। विधवा बहू याची और उसके दो नाबालिग बच्चों के अलावा परिवार में अन्य कोई वारिस नहीं है। याची ने मृतक आश्रित कोटे में दुकान के आवंटन की अर्जी दी। जिसे यह कहते हुए निरस्त कर दिया गया कि पांच अगस्त 2019 के शासनादेश में बेटी को परिवार में शामिल किया गया है किन्तु बहू को परिवार से अलग रखा गया है। कोर्ट ने शासनादेश में बहू को परिवार से अलग करने को समझ से परे बताया और कहा कि बहू को आश्रित कोटे में बेटी से बेहतर अधिकार प्राप्त है। इसलिए बहू को परिवार में शामिल किया जाए।

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