Allahabad High Court: पिता और दादा-दादी हत्या आरोपित तो ननिहाल में रहना बच्ची के हित में

दहेज हत्या की एफआइआर में दादा-दादी और पिता आरोपियों में शामिल हैं और वे आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे हैं। ऐसे में याचियों को बच्ची की कस्टडी प्रदान करना पूरी तरह से नाबालिग बच्ची के हित के खिलाफ होगा।

Ankur TripathiTue, 26 Oct 2021 03:02 PM (IST)
दादा-दादी की हैबियस कार्पस याचिका को बच्ची के हित को सर्वोपरि मानते हुए खारिज कर दिया।

​​प्रयागराज, विधि संवाददाता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ननिहाल में नाना-नानी के साथ रह रहे बच्चे की कस्टडी की मांग करने वाली दादा-दादी की हैबियस कॉर्पस याचिका को उसके हित को सर्वोपरि मानते हुए खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि मामले से यह स्पष्ट नहीं है कि नाबालिग को उसके नाना के पास रखना किस तरह से अवैध और अनुचित कस्टडी है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि बच्ची बचपन से ही अपने नाना के साथ रह रही है। वहीं दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि कस्टडी का दावा करने वाला पिता बच्ची की मां की मौत मामले में आरोपी है और यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि याचिका खारिज करने योग्य है।

नाना की देखरेख में रहना अवैध नहीं

यह आदेश न्यायमूर्ति डा वाईके श्रीवास्तव ने नाबालिग बच्ची की कस्टडी की मांग करने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दिया है। वहीं बच्ची के पिता पर दहेज की मांग को लेकर उत्पीड़न और क्रूरता करने का आरोप लगाया गया है। उसके खिलाफ दहेज हत्या की एफआइआर दर्ज कराई गई है। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि नाबालिग बच्ची की मां की अनुपस्थिति में उसके पिता हैं जो हिंदू एडॉप्शन एक्ट की धारा 6 के अनुसार उसके प्राकृतिक अभिभावक होंगे। इस प्रकार यह तर्क दिया गया कि नाना के पास बच्ची की कस्टडी अवैध है। विपक्षियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने यह कहकर उक्त दावे का खंडन किया कि नाबालिग लड़की उस समय से अपने नाना की कस्टडी में है जबसे उसकी मां को दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था। प्रताड़ना व क्रूरता के कारण उसकी मां की मृत्यु होने के बाद, नाबालिग बच्ची अपने नाना की देखभाल और कस्टडी में है। इसे किसी भी तरह से अवैध नहीं ठहराया जा सकता है।

हत्या के आरोपित को कस्टडी देना बच्ची के हित में नहीं

यह भी कहा गया कि दहेज हत्या की एफआइआर में दादा-दादी और पिता आरोपियों में शामिल हैं और वे आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे हैं। ऐसे में याचियों को बच्ची की कस्टडी प्रदान करना पूरी तरह से नाबालिग बच्ची के हित के खिलाफ होगा। न्यायालय ने कहा कि अदालतों के लिए ऐसे मामलों में बच्चे के सर्वाेत्तम हित में क्या है, इस पर विचार करना आवश्यक होगा। इसलिए जब तक यह बच्चे के कल्याण के लिए आधार व तथ्य प्रतीत न हो, उसे पिता और दादा-दादी की कस्टडी में भेजने का आदेश नहीं दिया जा सकता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण की एक याचिका में कस्टडी के दावे को पूर्ण अधिकार नहीं माना जा सकता है और बच्चे के हित में जो प्रतीत होगा, वहीं किया जाएगा। ऐसे मामलों में, यह स्वतंत्रता का नहीं बल्कि पालन-पोषण और देखभाल का सवाल है। बच्चे के कल्याण पर प्रतिस्पर्धी कस्टडी से संबंधित मामलों का फैसला करते समय बच्चे का हित व भविष्य सर्वोपरि है जो पक्षकारों के कानूनी अधिकारों पर मजबूत पक्ष होगा।

पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच के बयान पर केंद्रीय मंत्री का पुतला फूंका

हाईकोर्ट बार की निवर्तमान कार्यकारिणी ने पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट की बेंच के समर्थन में बयान देने के लिए केंद्रीय राज्यमंत्री एसपीएस बघेल की निंदा की। साथ ही इस बयान के विरोध में निवर्तमान महासचिव प्रभाशंकर मिश्र के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्री का पुतला भी फूंका। महासचिव प्रभाशंकर मिश्र के अनुसार कार्यकारिणी की बैठक में पश्चिमी बेंच के बारे में बयान की निंदा करते हुए राज्य सरकार को चेतावनी दी गई कि यदि यही मंशा रही तो सरकार 2022 के विधानसभा चुनाव में वकीलों का विरोध झेलने को तैयार रहे। बैठक व पुतला दहन में अनुराधा सुंदरम, रश्मि त्रिपाठी, वरुण शुक्ल, अजय शुक्ल, परितोष शुक्ल, अनिल कुमार यादव, प्रदीप तिवारी आसरा, राजेश पचौरी, माधवानंद शुक्ल, शादाब, जिया, परवेज खान, आलोक मिश्र, अखिलेश मिश्र, मनोज पांडेय आदि शामिल रहे।

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