लिव इन रिलेशन में रह रही शादीशुदा महिला को संरक्षण देने से हाई कोर्ट का इन्कार, 5 हजार हर्जाना भी लगाया

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव इन रिलेशन में रह रही शादीशुदा महिला को संरक्षण देने से इन्कार करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने पांच हजार रुपये हर्जाना भी लगाया है। हर्जाने की रकम राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराने का निर्देश दिया गया है।

Umesh TiwariThu, 17 Jun 2021 09:14 PM (IST)
लिव इन रिलेशन में रह रही शादीशुदा महिला को संरक्षण देने से इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन्कार किया।

प्रयागराज, जेएनएन। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव इन रिलेशन में रह रही पहले से शादीशुदा महिला को संरक्षण देने से इन्कार करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने पांच हजार रुपये हर्जाना भी लगाया है। हर्जाने की रकम राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराने का निर्देश दिया गया है। यह आदेश न्यायमूर्ति केजे ठाकर व न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की खंडपीठ ने दिया है।

हाई कोर्ट ने सवाल किया कि क्या हम ऐसे लोगों को संरक्षण देने का आदेश दे सकते हैं, जिन्होंने दंड संहिता और हिंदू विवाह अधिनियम का खुला उल्लंघन किया हो? कोर्ट का कहना था कि अनुच्छेद-21 सभी नागरिकों को जीवन की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता कानून के दायरे में होनी चाहिए, तभी संरक्षण मिल सकता है।

याची अलीगढ़ निवासी महिला का कहना था कि वह अपनी मर्जी से पति को छोड़कर दूसरे व्यक्ति के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही है। पति और उसके परिवार के लोग उसके शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप कर रहे हैं, इसलिए उनको ऐसा करने से रोका जाए। साथ ही उसे सुरक्षा देने की कार्रवाई की जाए।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि याची वैधानिक रूप से विवाहित है। जिस किसी भी कारण से वह अपने पति से अलग होकर दूसरे व्यक्ति के साथ रह रही है क्या इस स्थिति में उसे अनुच्छेद-21 का लाभ दिया जा सकता है? कोर्ट ने कहा कि यदि महिला के पति ने प्रकृति विरुद्ध (377 आइपीसी के तहत) अपराध किया है, तब ऐसी स्थिति में याची महिला को प्राथमिकी दर्ज करानी थी। याची ने कभी प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई है। हाई कोर्ट ने संरक्षण देने से इन्कार करते हुए याची पर पांच हजार रुपये का हर्जाना लगाया। हर्जाने की रकम राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराने का निर्देश दिया गया है।

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