राजा महेंद्र प्रताप सिंह का जिंदगीनामाः एएमयू को जमीन और देश पर जीवन कुर्बान

राजा महेंद्र प्रताप सिंह। एक एेसे राजा जिन्होंने अपना सब कुछ देश पर न्यौछावर कर दिया। न घर की चिंता की और न परिवार की। अंग्रेजों ने संपत्ति से बेदखल कर दिया। पर वे घबराए नहीं। उनके नाम से अब अलीगढ़ में विश्वविद्यालय स्थापित किया जा रहा है।

Mukesh ChaturvediFri, 17 Sep 2021 06:14 PM (IST)
मुरसान नरेश महेंद्र प्रताप सिंह, जिन्होंने अफगानिस्तान में जाकर भारत की अंतरिम सरकार का गठन किया था।

संतोष शर्मा, अलीगढ़ः देश को आजादी दिलाने में अनेक लोगों ने जिंदगी खपा दी। इन्हीं में शामिल राजा महेंद्र प्रताप सिंह का जिंदगीनामा उनके त्याग और संघर्ष की कहानी से भरा हुआ है। शिक्षा के प्रसार प्रसार के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) को जमीन दी। वृंदावन में प्रेम विद्यालय की स्थापना कराकर देश को पहला तकनीकी शिक्षा केंद्र दिया। वहीं, देश सेवा के लिए पूरा जीवन समर्पित किया। रानी बलवीर कौर ने भी राजा के इस संघर्ष पर सब कुछ न्यौछावर कर दिया। देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के लिए दोनों करीब 12 साल एक-दूसरे से दूर रहे। रानी ने छोटे-छोटे बच्चों को बड़ी मुश्किलों में पाला। देश आजाद होने पर राजा जब विदेश से लौटे तो रानी के अलावा जवान बेटेे का भी देहांत हो चुका था। इस त्याग के बाद भी राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर एेसा कोई भवन या स्मारक नहीं है। यह कमी अब दूर होने जा रही है। एएमयू ने उनकी जमीन पर बने स्कूल का नाम उनके नाम से करने का प्रस्ताव केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को भेजा है तो राज्य सरकार उनके नाम से विश्वविद्यालय की स्थापना कर रहा है। इसका शिलान्यास 14 सितंबर को जिले के लौधा ब्लाक क्षेत्र स्थित गांव मूसेपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया।

मुरसान में हुआ जन्म

मुरसान के राजा घनश्याम सिंह के यहां एक दिसंबर 1886 को जन्मे राजा महेंद्र प्रताप को हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने गोद ले लिया था। उनके कोई संतान नहीं थी। दोनों राजाओं में पारिवारिक रिश्ते थे। राजा हरनारायण सिंह ने बालक महेंद्र प्रताप को शिक्षा दिलाने के लिए वर्ष 1895 में अलीगढ़ के गवर्नमेंट हाईस्कूल (अब नौरंगीलाल इंटर कालेज) भेजा। राजा हरनारायण सिंह और घनश्याम सिंह के एएमयू संस्थापक सर सैयद अहमद खां से घनिष्ठ मित्रता थी। सर सैयद के अनुरोध पर राजा ने उसी साल महेंद्र प्रताप का दाखिला मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल (एमएओ) कालेज में करा दिया। बाद में यही एमएओ एएमयू के नाम से विख्यात हुआ। एमएओ कालेज में महेंद्र प्रताप ने शाही ठाठ से पढ़ाई की थी। अलग हास्टल में उनकी सेवा के लिए 10 नौकर रहते थेे। पिता की मौत के कारण राजा को रियासत संभालनी पड़ी और 12वीं के बाद कालेज छोडऩा पड़ा।

ससुराल में तोपों से सलामी

राजा महेंद्र प्रताप की विवाह वर्ष 1902 में हरियाणा के जींद रियासत के सिद्धू जाट परिवार के महाराज रंजीत सिंह की पुत्री बलवीर कौर से हुआ था। बरात दो ट्रेनों से संगरूर गई थी। महेंद्र प्रताप जब भी ससुराल जाते तो उन्हेंं 11 तोपों की सलामी दी जाती। वर्ष 1905 में वह पत्नी बलवीर कौर को विदेश यात्रा पर ले गए थे। वर्ष 1909 में पुत्री भक्ति और 1913 में पुत्र प्रेम प्रताप पैदा हुआ। इससे पहले ही जाट राजा के मन में कुछ और चलने लगा। वर्ष 1906 में राजा महेंद्र प्रताप ने कोलकता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया था। यह अधिवेशन उनके लिए अहम साबित हुआ, वह स्वदेशी के रंग में रंग गए। महाराज रंजीत सिंह ने राजा के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने का विरोध किया था। लेकिन राजा पर इसका कोई असर नहीं हुआ। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1914 में वह विदेश चले गए। देश छोडऩे के समय राजा देहरादून में थे।

अंग्रेजों के खिलाफ चुनौती

राजा महेंद्र प्रताप ने अफगानिस्तान में एक दिसंबर 1915 को भारत की अंतरिम सरकार बनाई थी। ये वो दौर था जब स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था। अंग्र्रेजों ने राजा के परिवार को परेशान करने और राजा पर दबाव डालने के लिए 1923 में राजा महेंद्र प्रताप सेंट्रल एक्ट लाकर उन्हेंं रियासत से बेदखल कर संपत्ति कब्जे में ले ली। राजा के प्रपौत्र चरत प्रताप सिंह के अनुसार अंग्रेजों के इस फैसले के खिलाफ राजा के बेटे प्रेम प्रताप ने चुनौती दी और कहा कि हम कहां जाएंगे। इस पर 1924 में अंग्रेज सरकार ने नया आदेश जारी करते हुए परिवार को संपत्ति वापस कर दी। लेकिन राजा का संपत्ति से मालिकाना हक छीन लिया। 1946 में प्रेम प्रताप के निधन के बाद सारे अधिकार उनके बेटे अमर प्रताप को मिल गए। आजादी के बाद राजा अपने देश आए तो उनकी संपत्ति को लेकर 1960 में संसद बैठी और ब्रिटिश सरकार वाली शर्त खत्म करते हुए राजा को संपत्ति पर हक दिलाया। इसके लिए राजा महेंद्र पताप सिंह के नाम से बिल पास हुआ। किसी नागरिक के लिए संसद में पास हुआ यह देश का पहला व्यक्तिगत बिल भी था। 

विदेश जाने से भारत लौटने का सफर

राजा दुनिया की सबसे पुरानी ट्रैवल कंपनी थामस कुक के मालिक के साथ बिना पासपोर्ट कंपनी के स्टीमर से इंग्लैड गए। उनके साथ स्वतंत्रता संग्राम सैनानी स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती के पुत्र हरिचंद्र भी थे। इंग्लैड से राजा जर्मनी गए। वहां से बुडापेस्ट (हंगरी ), टर्की होकर अफगानिस्तान पहुंचे और 1915 में काबुल में भारत के लिए अंतरिम सरकार की घोषणा की। इस सरकार के राष्ट्रपति राजा स्वयं बने और प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्ला खां को बनाया। बरकतुल्ला खां राष्ट्रीय आंदोलन के बड़े नेता और गदर पार्टी के नेता थे। इसके बाद अफगानिस्तान ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। इसी दौरान राजा रूस गए और लेनिन से मुलाकात की। मगर लेनिन से उन्हेंं सहायता नहीं मिली। अफगानिस्तान में भारत की अंतरिम सरकार 1915 से 1919 तक रही। इसके बाद राजा 1946 तक विदेश में रहे। 1946 में लौटे तो कोलकाता हवाई अड्डे पर उनका स्वागत उनकी बेटी भक्ति ने किया। सरदार पटेल की बेटी मणिबेन भी थीं। 

रानी का तप, बिखर गया परिवार

राजा का विदेश जाना उनके परिवार का बिखर जाना जैसा रहा। रानी बलवीर कौर ने बेटा और बेटी की तो जिम्मेदारी संभाली ही खुद को भी मजबूत बनाया। उन्हेंं पता था कि उनके पति ऐसी यात्रा पर गए हैं जिसकी सफलता से देश गुलामी से मुक्त होगा। राजा को अंग्रेजों ने देशद्रोही घोषित कर दिया था, इसलिए वह भारत नहीं आ सकते थे। पति के इंतजार में रानी ने करीब 12 साल बिताए। राह देखते-देखते उनका वर्ष 1926 में निधन हो गया। इसके 17 साल बाद एक और झटका लगा, उनके 34 वर्षीय बेटे प्रेम का भी निधन हो गया। 

एएमयू को दी लीज पर जमीन

देश सेवा में पूरा जीवन लगाने वाले जाट राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए भी खूब काम किया। वर्ष 1909 में उन्होंने वृंदावन में प्रेम विद्यालय की स्थापना कराकर देश को पहला तकनीकी शिक्षा केंद्र दिया था। एएमयू में वे खुद तो पढ़े ही थे, उनके पिता राजा घनश्याम सिंह की संस्था संस्थापक सर सैयद से दोस्ती थी। शिक्षा के प्रति समर्पित राजा महेंद्र प्रताप ने एएमयू को वर्ष 1929 में 3.8 एकड़ जमीन 90 साल की लीज पर दे दी। शुल्क तय किया था दो रुपये सालाना। जीटी रोड पर कोल तहसील के पास एएमयू के सिटी स्कूल के पीछे ये जमीन है। एएमयू जैसी संस्था को जमीन देकर राजा ने संदेश दिया था कि शिक्षा के प्रसार में किसी तरह का भेदभाव नहीं करना है। चाहे किसी भी जाति-धर्म के हों, सभी भारतीय हैं और उन्हें बेहतर शिक्षित करना है। उनकी इस दरियादिली की तारीफ आज भी होती है। बाद में वह मथुरा से सांसद भी बने। 29 अप्रैल 1979 में उनका निधन हो गया। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी आत्मकथा 'माई लाइफ स्टोरीÓ में लिखा है कि उन्हेंं गुल्ली डंडा के साथ टेनिस व चेस का शौक था। कालेज की छुट्टियों में अपना समय मुरसान व वृंदावन में बिताते थे। इसका जिक्र राजा महेंद्र प्रताप ने अपनी आत्मकथा माई लाइफ स्टोरी में किया है।

सर सैयद की हर मदद करते थे राजा के पिता 

ब्रिटिश सरकार के समय एमएओ कालेज के रूप में एएमयू की नींव रखने वाले सर सैयद अहमद खां और राजा महेंद्र प्रताप सिंह के पिता घनश्याम सिंह में गहरी मित्रता थी। घनश्याम सिंह के परिवार के राजा टीकाराम सिंह का आवास उन दिनों में अलीगढ़ में हुआ करता था, जहां इन दिनों डीएम आवास है। एमएओ कालेज भ्रमण पर आने वाले अंग्रेज गवर्नर व वायसराय ट्रेन से अलीगढ़ आते थे।सर सैयद तब स्टेशन से अंग्रेज अफसरों को कालेज ले जाने के लिए राजा टीकाराम सिंह की बग्घी का इस्तेमाल किया करते थे। एएमयू के पूर्व पीआरओ डा. राहत अबरार के अनुसार सर सैयद ने 1964 में साइंटिफिक सोसायटी बनाई तब राजा घनश्याम सिंह और राजा टीकाराम सिंह ने बड़ी मदद की थी। दान भी दिया। एसएस हाल में घनश्याम सिंह के नाम पर एक कमरा भी है। जिसके लिए उन्होंने दान दिया था।

एएमयू का दावा

एएमयू की तरफ से हर बार एक ही दावा किया गया कि यूनिवर्सिटी का मुख्य कैंपस 74 एकड़ फौजी छावनी की जमीन (जहां एएमयू का एसएस हाल है) पर बना हुआ है। इस जमीन पर ही सर सैयद अहमद खां ने आठ जनवरी 1877 को मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कालेज की नींव रखी थी। 1920 में इसी कालेज को यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला। लेकिन, राजा महेंद्र प्रताप सिंह के प्रपौत्र चरत प्रताप सिंह राजा द्वारा एएमयू को दी गई जमीन पर नजर रखे हुए थे। उन्हेंं इंतजार था तो बस समय का। लीज का समय पूरा होते ही 2018 में एएमयू को लीगल नोटिस दिया कि यूनिवर्सिटी का सिटी स्कूल जिस जमीन पर बना हुआ है उसे राजा ने 1928 में 90 साल के लिए लीज पर दिया था। यह स्कूल यूनिवर्सिटी के मुख्य कैंपस से बाहर जीटी रोड पर नुमाइश मैदान के पास है। स्कूल के पास खाली पड़ी तिकोना जमीन भी इसी का हिस्सा है। जिस पर स्कूल का खेल मैदान है। चरत प्रताप ने सबसे पहले इसी खाली जमीन पर दावा किया गया था। जब उन्होंने स्कूल के दस्तावेज खंगाले तो पता चला कि स्कूल भी लीज की जमीन पर है। दस्तावेजों के अनुसार लीज 1927 में तैयार हुई। लागू 1928 में किया गया।

प्रपौत्र की शर्त पर स्कूल का नाम बदलने का प्रस्ताव मंत्रालय भेजा

एएमयू के सामने चरत प्रताप ने प्रस्ताव रखा कि स्कूल की जमीन उन्हेंं या तो वापस की जाए या स्कूल का नाम राजा के नाम पर किया जाए। स्कूल के बराबर की खाली पड़ी जमीन फिर वापस करनी होगी। प्रपौत्र के प्रस्ताव के बाद इसी साल जनवरी में विश्वविद्यालय की शीर्ष गवर्निंग बाडी एग्जीक्यूटिव काउंसिल(ईसी) की बैठक ने स्कूल का नाम बदलने का प्रस्ताव पास कर दिया था। इसके बाद प्रस्ताव शिक्षा मंत्रालय भेज दिया गया। रजिस्ट्रार अब्दुल हमीद ने बताया कि एग्जीक्यूटिव काउंसिल की रिपोर्ट पर सिटी स्कूल का नाम राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर करने के लिए चार माह पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को प्रस्ताव भेज दिया था। मंत्रालय से अभी तक कोई जवाब नहीं आया है। जवाब आते ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। यूनिवर्सिटी को इस पर भी गर्व है कि पूर्व छात्र के नाम पर राज्य यूनिवर्सिटी का निर्माण हो रहा है। चरत प्रताप सिंह ने बताया कि लीज खत्म होने पर 2018 में एएमयू को लीगल नोटिस दिया था। लीज में साफ लिखा हुआ है कि समय पूरा होने पर जमीन खाली कर वापस कर दी जाए। हमने प्रस्ताव दिया कि जमीन वापस की जाए या सिटी स्कूल का नाम राजा के नाम पर किया जाए। खाली तिकौना जमीन हमें वापस की जाए। 2019 में शुरू हुई बातचीत में एएमयू के तरफ से सकारात्मक जवाब मिला था। हम चाहते है कि एएमयू से हमारे पुराने संबंध यूं ही बने हैं। उम्मीद है जल्द विश्वविद्यालय इस पर निर्णय लेगा। ऐसा न होने पर हमें फिर से विचार करना पड़ेगा। यदि जमीन मिलती है तो उसके उपयोग के बारे में बाद में तय किया जाएगा। 

बंटबारे के खिलाफ थे राजा महेंद्र प्रताप

देश को आजाद कराने के लिए 32 साल विदेश में रहने के बाद राजा महेंद्र प्रताप जब 1946 में भारत आए तो यहां के हालात देखकर दंग रह गए। हालात ये थे कि देश के बंटवारे की बात चल रही थी। राजा इससे बड़े व्यथित हुए। उन्होंने उस समय के हर क्रांतिकारी व नेता से इसका विरोध जताया, लेकिन हुआ कुछ नहीं। देश दो टुकड़ों में बंट गया और पाकिस्तान दुनिया के नक्शे पर आ चुका था। 

घोड़ा था चुनाव चिह्न, घोड़े पर ही प्रचार

राजा के प्रपौत्र चरत प्रताप सिंह ने बताया कि देश बंटने की पीड़ा उन्हें जीवन में ताउम्र रही। राजनीतिक दलों की नीतियों से वह संतुष्ट नहीं थे इस कारण ही उन्होंने मथुरा से लोक सभा का निर्दलीय चुनाव लड़ा। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने 1957 में हुए लोकसभा के दूसरे चुनाव में मथुरा से भाग्य अपनाया। जीत भी हासिल की। राजा को चुनाव चिह्न घोड़ा मिला था। घोड़े पर ही वह प्रचार करते थे। वृंदावन उनकी कर्म भूमि थी। इसलिए लोगों का प्यार भी उन्हेंं भरपूर मिला। इस चुनाव में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को हराया था। हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है कि इस चुनाव में अटल जी ने मथुरा के अलावा लखनऊ और बलरामपुर से पर्चा भरा। बाद में अटल जी ने मथुरा से चुनाव न लड़ राजा को अपना समर्थन दे दिया। उन्होंने कहा भी था कि भले ही मैं हार जाऊं पर कांग्रेस नहीं जीत पाए। तब वह बलरामपुर से जीते थे और राजा मथुरा से।

योगी ने दो साल पहले की थी घोषणा

राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर यूनिवर्सिटी की घोषणा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जाट बहुल क्षेत्र जिले की इगलास विधानसभा सीट के लिए 2019 में हुए उपचुनाव के दौरान की थी। मुख्यमंत्री ने कई बार अपने भाषणों में राजा द्वारा एएमयू को जमीन तो दान करने का जिक्र भी किया। हालांकि एएमयू में राजा के नाम पर किसी इमारत या हाल का नाम नहीं है। एएमयू में राजा के नाम पर मौलाना आजाद लाइब्रेरी में उनकी एक तस्वीर ही है। हालांकि, लाइब्रेरी में राजा से जुड़ीं बहुत सी किताबें हैं। विवि पीआरओ उमर सलीम पीरजादा का कहना है कि विवि प्रशासन द्वारा राजा पर अनेक संगोष्ठियां आयोजित की जाती रही हैं। अपने पूर्व छात्र और सह्रदय प्रेमी के प्रति विवि आदर और सम्मान का भाव रखता है।

राजा महेंद्र प्रताप विवि का पहले बनेगा प्रशासनिक भवन

अलीगढ़ पलवल मार्ग पर लोधा के मूंसेपुर गांव के पास बन रहे राजा महेंद्र प्रताप विश्वविद्यालय के भवन का निर्माण हिसार की ईश्वर सिंह एसोसिएट कंपनी कर रही है। सबसे पहले फेस-वन पर काम शुरू होगा। जिसमें प्रशासनिक भवन का निर्माण मुख्य है। लाइब्रेरी के अलावा छात्र-छात्राओं के अलग-अलग दो हास्टल भी बनाए जाएंगे। कर्मचारियों के लिए टाइप-3 व टाइप-4 के क्वार्टर का भी निर्माण हाेना है। पुलिस चौकी के अलावा बाउंड्रीवाल का निर्माण भी जल्द शुरू होने की उम्मीद है। अलीगढ़-पलवल मार्ग से विवि के लिए जाने वाले मुख्य मार्ग को फोरलेन बनाया जाएगा।

नागर शैली में होगा निर्माण 

विवि का भवन निर्माण नागर शैली में होना है। जिसमें भवन का मुख्य द्वार महल की तरह दिखाई देगा। अलग-अलग भवनों के द्वार भी प्राचीन इमारतों की तरह दिखाई देंगे। विश्वविद्यालय के लिए जिला प्रशासन ने 92 एकड़ जमीन अधिगृहित की है। सरकार ने निर्माण के लिए 101 करोड़ की धनराशि जारी कर दी है। 22 जनवरी 2019 को विवि की अधिसूचना जारी हुई थी। कुलसचिव और वित्त अधिकारी की नियुक्ति हो चुकी है। विवि के क्षेत्र में अलीगढ़ मंडल के 395 महाविद्यालय शामिल किए गए हैं।

 

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