थाने व चौकियों में चलने वाली कानाफूसी बंद, अलीगढ़ की पुलिस में बहुत कुछ बदल रहा है, जानिए हुआ क्या Aligarh news

एक माह पहले की और अब की पुलिसिंग में जमीन-आसमान का अंतर है।

एक माह पहले की और अब की पुलिसिंग में जमीन-आसमान का अंतर है। पहरा पहले भी सख्त था लेकिन अब अंदर तक नजर गड़ी है। थाने व चौकियों में चलने वाली कानाफूसी बंद हो गई है। चुनाव में पहले भी पुलिसकर्मियों ने चोरी-छिपे प्रचार किया था।

Anil KushwahaSat, 17 Apr 2021 09:06 AM (IST)

अलीगढ़, जेएनएन। एक माह पहले की और अब की पुलिसिंग में जमीन-आसमान का अंतर है। पहरा पहले भी सख्त था, लेकिन अब अंदर तक नजर गड़ी है। थाने व चौकियों में चलने वाली कानाफूसी बंद हो गई है। चुनाव में पहले भी पुलिसकर्मियों ने चोरी-छिपे प्रचार किया था, लेकिन कार्रवाई पहली बार हुई है। अगर अब भी कोई शोर मचाए तो भगवान मालिक है। कुछ दारोगा इसी श्रेणी में हैं। रिश्वत तो नहीं ले सकते, लेकिन परोक्ष रूप से कुछ ऐसा मांग लेते हैं, जो रिश्वत से भारी हो। संवेदनशील इलाके के एक सज्जन कहने लगे कि विवेचना में मदद करने का दारोगा ने भरोसा दिया। रिश्वत लेने से साफ इन्कार कर दिया। हमें अच्छा लगा। बाद में कहने लगे कि एक चीज दिला दो। पता चला कि उसकी कीमत रिश्वत से बड़ी थी। थानों में निचले स्तर पर बैठे पुलिसकर्मियों का भी यही हाल है। ये आदत छूट जाए तो अच्छा है।

सट्टे पर जोर नहीं

कुछ गोरखधंधे शहर को कलंकित करते हैं। इन्हीं में से एक सट्टेबाजी है, जो कभी जड़ से खत्म नहीं हो सकती। इसे खत्म करने के प्रयास रुकने नहीं चाहिए। जिले में सट्टेबाजी के खिलाफ अभियान चल रहा है, लेकिन अभी भी कई जगह सट्टा जारी है। इससे समाज के लोग प्रभावित होते हैं। दिक्कत तब होती है, जब ये काले काम पुलिस की नाक के नीचे चलते हैं। जीवनगढ़ का एक युवक कुछ दिन पहले कप्तान से शिकायत करने पहुंचा। बोला- सट्टे और चरस की वजह से महिलाओं से छेड़छाड़ की बात आम हो गई है। नौजवान खोखले हो रहे हैं। घरों में चूल्हे नहीं जल रहे हैैं। इसमें पुलिस की मिलीभगत है या नहीं, ये जांच का विषय है। लेकिन, इस तरह का माहौल होना भी पुलिस की खामी है। इस पर गंभीर होना पड़ेगा। जहां-जहां ये माहौल खराब है, उसे सुधारकर संलिप्त पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई करनी होगी।

कुछ अराजक तत्व विलीन हैं

पंचायत चुनाव आ गए हैं। जिले में नामांकन शनिवार से शुरू हो जाएंगे। ऐसे में पुराने विवाद भी उखड़कर सामने आएंगे। पुलिस ने आश्वस्त तो कर दिया है कि जिले में पूरी चौकसी है, लेकिन निगरानी पैनी रखनी होगी। कुछ अराजक तत्व ऐसे हैं, जो विलीन रहते हैं। न तो पुलिस के सामने आते हैं, न ही किसी के संपर्क में रहते हैं। माहौल बिगाडऩे में इनकी पूरी भूमिका रहती है। लोग ऐसे अराजक तत्वों से तंग रहते हैं, लेकिन चाहते हुए भी शिकायत नहीं कर पाते। हरदुआगंज के एक गांव में अति हो गई तो लोग कप्तान के पास शिकायत करने पहुंच गए। यहां एक अपराधी पर 50 मुकदमे दर्ज हैं। फिर भी पुलिस की नजर से बचा हुआ है। ग्रामीणों के खौफ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने मुकदमों की सूची पुलिस को सौंप दी। आश्वासन मिला है तो कार्रवाई की उम्मीद है।

हम चाबुक का इंतजार क्यों करें

कोई भी पहल करने से पहले हमें खुद से शुरुआत करनी चाहिए। इस बात को हमें अब अपनाना होगा। एक साल पहले इसी वक्त कोरोना ने खूब दर्द दिए थे। वही समय तेजी से लौटा है। हम दूसरों को सतर्कता बरतने की बात करते हैं, पर खुद नहीं संभलते। पिछले साल घर-घर खाना पहुंचाने वाली खाकी के सामने फिर से वही संकट आ गया है। शहर के बाजार, सार्वजनिक स्थल पर भीड़ रहती है। लोग मास्क नहीं पहन रहे हैैं। पुलिस समझाने में लगी है, हम नहीं सुन रहे हैैं। हम चाबुक चलने का इंतजार क्यों करते हैं। शहर हमारा है तो पुलिस भी हमारी है। हमें पुलिस के लिए सहयोग की भावना जागृत करनी होगी। फिलहाल जिले के हालात इतने बिगड़े नहीं हैं, लेकिन वो समय दूर नहीं कि हाहाकार मच जाए। ऐसे में खाकी की परेशानी दोगुनी है। इसे देखिए, समझिए व मिलकर शहर को संकट से उबारिए।

 

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