अलीगढ़ में CM Yogi के हेलीपैड की सुरक्षा गायब होने पर लगी थी पुलिसकर्मियों को लताड़ा

सीएम की सुरक्षा में लापरवाही कैसे हुई ? देखा जाए तो यह मामूली बात थी।

मुख्यमंत्री का प्रोटोकाल भला कौन नहीं जानता? उनके जिले में पैर रखते ही अफसरों की सिट्टी-पिट्टी गुल हो जाती है। फिर सीएम की सुरक्षा में लापरवाही कैसे हुई? देखा जाए तो यह मामूली बात थी। लेकिन सीएम के मामले में मामूली बात भी बड़ी बन जाती है।

Sandeep Kumar SaxenaSat, 15 May 2021 08:49 AM (IST)

अलीगढ़, जेएनएन। मुख्यमंत्री का प्रोटोकाल भला कौन नहीं जानता? उनके जिले में पैर रखते ही अफसरों की सिट्टी-पिट्टी गुल हो जाती है। फिर सीएम की सुरक्षा में लापरवाही कैसे हुई? देखा जाए तो यह मामूली बात थी। लेकिन, सीएम के मामले में मामूली बात भी बड़ी बन जाती है। सीएम के आने से कुछ देर पहले हेकड़ी जमाने वाले सुरक्षाकर्मी उनके जाते ही कहां चले गए? हेलीपैड की सुरक्षा गायब हुई तो सीएम की सुरक्षा टीम के सदस्य ने लताड़ लगा दी। पवेलियन में बैठे जवानों से लेकर वहां मौजूद प्रभारी को खरी-खरी सुनाईं। महिला एसओ को ये तक कहा कि गार्ड आएंगे या मैं फोन लगाऊं? इसके बावजूद सेफ हाउस में बैठे जवानों के कान पर जूं नहीं रेंगी। जवानों के इस रवैये में त्रस्तता की बू आ रही थी। खैर, अच्छी बात रही कि सब सकुशल निपट गया। लेकिन, ये रवैया भविष्य के लिए घातक हो सकता है।

ये कैसा प्रहार

जिले में इन दिनों अपराधियों की धरपकड़ के लिए ताबड़तोड़ आपरेशन चल रहे हैं। इनमें सबसे सख्त है? आपरेशन प्रहार। पुलिस रोजाना आपरेशन प्रहार के तहत शराब तस्करी, सट्टेबाजी, जुआ, मादक पदार्थ तस्करी के दर्जनों आरोपितों को पकड़ रही है। लेकिन, फिर भी गली-गली में यह कारोबार फल-फूल रहे हैं। आरोपितों को कोई डर भी नहीं है। सासनीगेट, देहलीगेट, गांधीपार्क थाना क्षेत्र की कई तंग गलियों में सट्टा, जुआ आम बात है। पुडिय़ों में गांजा बिकता है। प्रतिबंध के बावजूद घर-घर से शराब धड़ल्ले से बेची जाती है। पुलिस को सब खबर रहती है। लेकिन, हर बार बाहरी लोगों को पकड़कर खानापूर्ति कर ली जाती है। बड़ी मछलियां कभी हाथ ही नहीं आती या फिर सांठगांठ ऐसी हो जाती है? कि पुलिस हाथ डाल नहीं पाती। क्या यही प्रहार है? अगर प्रहार करना ही है? तो निष्पक्ष रूप से किया जाए, ताकि अवैध धंधा करने वालों में भय पैदा हो।

चौकी आओ, वहीं मसला हल होगा...

पिछली बार लाकडाउन में हर रोज पुलिस की सार्थक गाथाएं सुनने को मिल जाती थीं। इस बार हालात जितने खराब हैं, उतना ही संकट पुलिस के सामने भी है। लेकिन, इस दौर में भी कुछ पुलिसकर्मी गरीबों पर जुल्म ढहाने से पीछे नहीं हट रहे हैं। ढकेल लगाकर दो वक्त की रोजी कमाने वाले मजदूरों पर डंडा चलाना कितना उचित है? महावीरगंज जैसे बाजार कुछ लैपर्डकर्मी खुद को कोतवाल से कम नहीं हांकते। एक सज्जन बताने लगे कि वसूली का खेल शुरू हो गया है। जो पैसा देता है, उन्हें दुकान खोलने के लिए समय की रियायत दे दी जाती है। कुछ दुकानदारों के फोटो खींचकर कहा जाता है? कि चौकी आ जाना... मसला वहीं हल होगा। बहरहाल, सख्ती जरूरी है? तो सबके लिए बराबर हो। बड़े साहब ने भी मानवता के नाते अभी इतनी सख्ती नहीं दिखाई है? तो निचले स्तर पर इतना रौब कहां से आ रहा है?

कई बार फ्रंट पर रहकर संभाला मोर्चा

पुलिस विभाग में अफसरों का इधर से उधर होना नियति है। अलीगढ़ की बात करें तो कम समय में बड़े बदलाव हुए हैं या यूं कहें कि पूरी पुरानी टीम ही बदल गई है। इन्हीं में एक कैंपस की कमान संभालने वाले क्षेत्राधिकारी भी रहे। उनका जाना तय था। लेकिन, दबी आवाज में अफसर भी इस बात को मानते हैं कि सीओ जहां खड़े हो जाते थे, वहां विवाद की गुंजाइश भी मानो खत्म हो जाती थी। कैंपस बवाल में फ्रंट पर रहकर मोर्चा संभालने वाले सीओ ने लोगों में अलग विश्वास बना लिया था। सीएए के विरोध में जंगलगढ़ी का धरना समाप्त कराया तो शासन से भी शाबाशी मिली थी। उम्रदराज होने के बावजूद कैश वैन लूट, डाक्टर अपहरणकांड, करोड़ों की ज्वेलरी लूट जैसी बड़ी घटनाओं में सार्थक भूमिका निभाई। लेकिन, बदलाव ही प्रकृति का नियम है। इस कतार में जल्द ही कई नाम और भी जुडऩे वाले हैं।

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