सरयूपार लीला जो पूरे पश्चिमी यूपी में है प्रसिद्ध...इस बार ऐसी है तैयारीAligarh News

भले ही प्रभु श्रीराम के बारे में आप जानते हों। उनके जीवन और उनकी कहानियों के बारे में अच्छे से परिचित हों। रामचरित मानस का पाठ कर चुके हों टीवी सीरीयल पर रामायण देख चुके हों मगर फिर भी राम के बारे में जानने की इच्छा कम नहीं होती है।

Sandeep Kumar SaxenaFri, 15 Oct 2021 03:32 PM (IST)
प्रभु श्रीराम का बखान अनंत है, जिसे 100 बार भी सुनेंगे तो वह कम पड़ जाएगा।

अलीगढ़, जागरण संवाददाता। भले ही प्रभु श्रीराम के बारे में आप जानते हों। उनके जीवन और उनकी कहानियों के बारे में अच्छे से परिचित हों। रामचरित मानस का पाठ कर चुके हों, टीवी सीरीयल पर रामायण देख चुके हों, मगर फिर भी राम के बारे में जानने की इच्छा कम नहीं होती है। फिर भी हर वर्ष रामलीला में पहुंचने का मन कर पड़ता है। रामलीला का समय आते ही मन हिलोरे मारने लगता है। जबकि अधिकांशत: लोगों को पता है कि श्रीराम लीला में क्या मंचन होने वाला है। यह इसलिए है क्योंकि राम की लीला अनंत है।

ऐसी है प्रभु की लीला

प्रभु श्रीराम का बखान अनंत है, जिसे 100 बार भी सुनेंगे तो वह कम पड़ जाएगा। इसलिए प्रभु श्रीराम के किसी भी चरित्र का बखान होता है तो बरबस ही जुड़ाव हो जाता है। फिर, रामलीला देखने के लिए मन उमड़ पड़ता है। मगर, इस बार श्रीराम लीला गोशाला कमेटी, अचलताल पर सरयू पार लीला नहीं होगी। करीब 100 वर्ष बाद ऐसा हो रहा है जब सरयू पार लीला का मंचन नहीं होगा। वरना, अलीगढ़ की सरयूपार लीला के मंचन पूरे पश्चिमी यूपी में प्रसिद्ध था। एक महीने से ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती थी। सरोवर में यदि पानी नहीं रहता था तो उसे पंप से भरवाया जाता था। प्रशासन और नगर निगम की टीम तैयारियों में जुट जाती थी। अचल सरोवर को लाइटों से सजाया जाता था। रोशनी से नहाया अचल सरोवर देखते ही बनता था, भव्य और दिव्य अचल सरोवर ऐसे लगता था कि मानों जैसे धरती पर स्वर्ग उतर आया हो। सरयू पार लीला प्रभु श्रीराम के वनवास के बाद होती है। प्रभु श्रीराम पत्नी सीता और अपने अनुज लक्ष्मण के साथ वनवास को प्रस्थान करते हैं तो गंगा पार करते समय का लीला का मंचन किया जाता है। प्रभु श्रीराम गंगा नदी पार करते हैं तो केवट पांव पखारने के लिए आगे बढ़ते हैं। केवट कहते हैं कि प्रभु बिना पांव पखारने नाव पर नहीं चढ़ने देंगे। तुम्हारे पांव में जादू है, तुम स्पर्श करते हो तो पत्थर से नारी बन जाती है, इसलिए बिना पांव धुले हुए नहीं नाव पर बैठने देंगे। राम-केवट का भावुक प्रसंग होता है। यह दृश्य देखने के लिए अचल सरोवर पर सैकड़ों का सैलाब उमड़ता।

यह है वजह

ग्रामीण क्षेत्र से भी दर्शक आते हैं। नाव को भव्य तरीके से सजाया जाता है। सुरक्षा के खास इंतजाम किए जाते हैं। प्रभु श्रीराम को नाव से पार होते देख भाव से भर जाता है। महोत्सव के संयोजक अरविंद कुमार का कहना है कि प्राचीन परंपरा है, मगर इस बार कोरोना के चलते इस परंपरा का निर्वहन नहीं हो पा रहा है, वहीं अचल में काम भी चल रहा है, जिसके चलते मंचन नहीं हो सकता है। आगे से भव्य तैयारी की जाएगी। तब तक अचल सरोवर पर निर्माण कार्य भी पूरा हो जाएगा। फिर यहां की सुंदरता देखते बनेगी।

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