अलीगढ़ में ऐसे तो खत्म नहीं होगा नेताओं का सियासी वनवास, विस्‍तार से जानिए मामला

दीदी की पार्टी करीब 30 साल से वनवास यूं ही नहीं झेल रही बल्कि इसके पीछे अनेक कारण रहे हैं। नेताओं की अति महत्वाकांक्षा और खुद को पार्टी से ऊपर समझने की प्रवृत्ति सत्ता हासिल करने की राह में हमेशा बाधा रही है।

Sandeep Kumar SaxenaTue, 07 Dec 2021 11:22 AM (IST)
बिना संगठन के सत्ता की परिकल्पना ही बेमानी है।

अलीगढ़, जागरण संवाददाता। दीदी की पार्टी करीब 30 साल से वनवास यूं ही नहीं झेल रही, बल्कि इसके पीछे अनेक कारण रहे हैं। नेताओं की अति महत्वाकांक्षा और खुद को पार्टी से ऊपर समझने की प्रवृत्ति सत्ता हासिल करने की राह में हमेशा बाधा रही है। दूसरी बात, संगठन से पार्टी चलती और बनती है और बिना संगठन के सत्ता की परिकल्पना ही बेमानी है। यह बात दीदी और हाईकमान यहां के नेताओं को समझाने में सफल नहीं हो पाई। यहां पर संगठन तो रहा, लेकिन बड़े नेताओं ने केवल अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उसे तैयार किया और इस्तेमाल किया। संगठन की बागडोर अपने हाथ में रखने के लिए करीबी लोगों की नियुक्तियां कराईं गईं। वर्तमान में भी कुछ ऐसा ही है। इन दिनों अधिकतर कमेटियां, प्रकोष्ठ व अन्य फ्रंटल संगठनों के पदाधिकारी केवल एक बड़े नेताजी के विधानसभा क्षेत्र में ही सक्रिय हैं। ऐसे तो सियासी वनवास खत्म होने से रहा।

कोविड टीकाकरण के साथ इलाज भी जरूरी

कोरोना महामारी से बचाव के लिए टीकाकरण ही सबसे बड़ा हथियार है। सरकार ने स्वास्थ्य विभाग को अधिक से अधिक टीकाकरण किए जाने के निर्देश दिए गए हैं। इससे जनपद में भी टीकाकरण अभियान युद्धस्तर पर चल रहा है। पिछले माह सप्ताहभर तक जनपद टाप-टेन में शामिल रहा। अधिकारियों ने टीकाकरण के लिए पूरी ताकत झोंक दी। आयुष्मान भारत, राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम, परिवार नियोजन, राष्ट्रीय अंधता निवारण, प्रधानमंत्री मातृ वंदन, क्षय रोग उन्मूलन समेत सभी राष्ट्रीय कार्यक्रम व योजनाएं पिछड़ गईं। क्योंकि, टीकाकरण बढ़ाने के लिए दूसरे कार्यक्रमों में लगे चिकित्सक, सीएचओ, एएनएम, नर्स, फार्मासिस्ट, नेत्र परीक्षक, आशा आदि कर्मचारियों की ड्यूटी कोविड टीकाकरण में लगा दी गई। इससे जनपद टीकाकरण में तो आगे निकल गया, लेकिन अन्य कार्यक्रमों में रैकिंग औंधे मुंह गिर गई। स्वास्थ्य केंद्रों पर उपचार तक बाधित हो गया है। साहब, टीकाकरण बहुत जरूरी है, लेकिन दूसरे कार्यक्रमों को बंद करना भी तो उचित नही।

घटिया फर्नीचर पर आपत्ति से साहब नाराज

पिछले दिनों घटिया फर्नीचर की खरीद को लेकर एक विभाग की खूब किरकिरी हुई। विभाग के नोडल अधिकारी ने ही घटिया फर्नीचर की आपूर्ति पर सवाल उठाए। विभागीय मुखिया को पत्र तक लिख दिया। फर्नीचर भी लौटा दिया। यह बात मीडिया व उच्चाधिकारियों तक पहुंच गई, जिसे लेकर मुखिया की नोडल अधिकारी से खूब नोकझोंक हुई। नौबत तूृ-तड़ाक पर आ गई। नोडल अधिकारी ने चार्ज वापस लेने का प्रस्ताव दिया। साहब ने तुरंत उनके चार्ज हटाकर दूसरे अधिकारी को दे दिए। लेकिन, भंडार गृह में उतारे गए फर्नीचर को प्रभारी कर्मचारी ने भी लेने से इन्कार कर दिया। नाराज मुखिया ने उसे भी पद से हटा दिया। शिकायत बड़े साहब तक पहुंची। बहरहाल, उन्होंने कर्मचारी को मंडलीय भंडार गृह में नियुक्त कर दिया। सवाल ये है कि अधीनस्थों की आपत्तियों को नजर-अंदाज करके उन पर ही कार्रवाई कितनी जायज है। जबकि, पूर्व में फर्नीचर घोटाला हो चुका है।

कर्मचारियों ने खोला मोर्चा तो ढीले पड़े तेवर

जिला स्तरीय अस्पताल के साहब कई बार व्यवस्थाओं को लेकर कर्मचारियों पर ज्यादा ही सख्ती कर बैठते हैं। कई बार ऐसी शिकायतें सामने आईं, जिनमें कर्मचारियों ने अपनी बात उनके समक्ष रखने की कोशिश की, लेकिन उनकी सुनी नहीं गई। उच्चाधिकारियों तक शिकायतें पहुंचाई कि साहब केवल अपनी बात कहते हैं, हमारी नहीं सुनते। इससे सभी को परेशानी हो रही है। उच्चाधिकारियों ने साहब को कई बार टोका भी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। नतीजतन, पिछले दिनों कर्मचारियों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। ट्रांसफर की मांग को लेकर कार्यालय के सामने ही बेमियादी धरना शुरू हो गया। दो-तीन दिनों तक साहब ने धरने को कोई तवज्जो नहीं दी, लेकिन जब सेवाएं बाधित होने लगीं और मामला तूल पकड़ता दिखा तो उनके तेवर ढीले पड़े। अधीनस्थों से माफी मांगकर पीछा छुड़ाया। हालांकि, एक संवर्ग के कर्मचारियों ने बुके देकर उनका आशीर्वाद लिया। लेकिन, साहब की किरकिरी तो हो ही गई।

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