अगले जनम मोहे लेखपाल ही कीजौ, आठ साल में ऐसे बने करोड़ों के मालिक Aligarh News

लेखपाल (पटवारी) के ठाठ के आगे बड़े-बड़े भी फेल हैं।

भगवान तुम्हे पटवारी बनाएं। गांव देहात में बुजुर्ग यह आर्शीवाद ऐसे ही नहीं देते। कहने को भले ही लेखपाल (पटवारी) राजस्व विभाग का सबसे छोटा कर्मचारी होता हो लेकिन इनके ठाठ के आगे बड़े-बड़े भी फेल हैं। अब सदर तहसील के ही एक लेखपाल के जलवे को देख लीजिए।

Sandeep kumar SaxenaTue, 23 Feb 2021 09:45 AM (IST)

अलीगढ़, जेएनएन।  भगवान तुम्हे पटवारी बनाएं। गांव देहात में बुजुर्ग यह आर्शीवाद ऐसे ही नहीं देते। कहने को भले ही लेखपाल (पटवारी) राजस्व विभाग का सबसे छोटा कर्मचारी होता हो, लेकिन इनके ठाठ के आगे बड़े-बड़े भी फेल हैं। अब सदर तहसील के ही एक लेखपाल के जलवे को देख लीजिए। महज आठ साल में ही इन्होंने पत्नी के नाम करोड़ों रुपये के 19 प्लाट खरीद डाले। भला, 30- 40 हजार महीने की नौकरी वाला कोई ईमानदारी लेखपाल इतनी कमाई नहीं कर सकता, लेकिन फिर भी कुछ अफसर इन्हें बचाने में लगे हैं। दो साल से फाइलों में यह जांच अटकी पड़ी है। अब बीते मामला बड़े साहब के सामने पहुंचा तो कुछ रफ्तार बढ़ी है। लेकिन, यह देखना अब भी दिलचस्प होगा कि कार्रवाई होती है या नहीं। हालांकि, इतना जरूर है कि लेखपाल के ऐसे जलवे देखकर जरूर हर कोई व्यंग्य जरूर मार रहा है। कुछ छोटे अफसर तो यहां तक बोल रहे हैं कि अगले जन्म मुझे लेखपाल ही कीजौ।

दावत भारी तो मजबूत दावेदारी

गांव देहात में पंचायत चुनाव की गर्माहट इन दिनों अपने पूरे शबाब पर है। प्रधानी व जिला पंचायत सदस्य का आरक्षण भले ही अभी नहीं हुआ हो, लेकिन सियासी सूरमाओं ने पहले से ही पूरे गुणा-गणित का पूरा अंदाजा लगा लिया है। इसी आंकड़ों के दम पर संभावित उम्मीदवार अब जनता में पकड़ बनाने मै जुटे हैं। कुछ लोग जहां विकास से जुड़े सपने दिखा कर लोगों काे लुभा रहे हैं तो कुछ गिफ्ट व उपहार के बहाने रिझाने में लगे हैं। कई गांव में तो अभी से दावतों का दौर शुरू हो गया है। हर प्रत्याशी अपने यहां दिन और रात्रि का अलग-अलग भोज करा रहा है। उन्हें लग रहा है कि जितनी दावत भारी होगी, उतनी ही उनकी दावेदारी मजबूत होगी, लेकिन यह पब्लिक है तो सब जानती है। यह दावत तो सभी की खाएंगे, लेकिन वोट उसी को देंगे जो गांव का भला करेगा। मुसीबत में लोगों का सहारा बनेगा।

एक शहर में दो नियम

आप भी कमाल के हैं साहिब। आदेशों से शहर में नियम लागू कराते हैं और कुछ खास लोगों के लिए इन नियमों में छूट भी दे देते हैं। शायद समझे नहीं। मामला राशन वाले विभाग से जुड़े साहब का है। पिछले दिनों एक ही तहसील में दो अलग अलग स्थानों पर राशन का चावल पकड़ा जाता है, लेकिन विभाग के क्षेत्रीय निरीक्षक एक में तो नामजद रिपोर्ट दर्ज करा देते हैं, लेकिन दूसरे में जांच के नाम पर खानापूर्ति कर क्लीन चिट देते हैं। माफिया पर मुकदमा तो दूर राशन तक वापस करा दिया जाता है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर कोई नियम है तो वह सभी के लिए एक जैसा ही होना चाहिए न। एक को बचाना और दूसरे को फंसाना तो आंखों में धूल झोंकने जैसा है। हालांकि, बड़े साहब ने पहले से ही सभी के खिलाफ सख्ती बरतने के सप्ष्ट निर्दश दे रखे हैं, लेकिन फिर भी क्षेत्रीय निरीक्षक की मेहरबानी समझ से परे है।

फाइल छिपाओ और मलाई खाओ

सरकार भले ही जीरो टालरेंस का दावा करती हो, लेकिन जमीं पर इसका ज्यादा असर नहीं है। अब शहरी विकास विभाग से जुड़े बाबुओं को ले लीजिए। यहां पर फाइल आगे बढ़ाने से लेकर छिपाने तक के लिए लेनदेन का खूब खेल चतला है। जब तक कोई इन बाबुओं का कोई मलाई चखने के लिए नहीं देता है, तब तक कोई भी फाइल आगे नहीं बढ़ सकती। अवैध निर्माणों की फाइलों में भी यह बाबू खूब खेल करते हैं। मलाई नहीं आने तक तो कार्रवाई के लिए फाइल तेजी से आगे बढ़ती हैं, लेकिन जैसे ही इन पर मलाई पहुंचती है तो रफ्तार स्वयं ही सुस्त हो जाती है। क्षेत्र में सुपरवीजन करने वाले कर्मियों की भी इसमें पूरी मिलीभगत रहती है। वह ही ऐसे भवन स्वामियों का चिन्हांकन कर फाइलों में मलाई का संदेश देते हैं। कई बार तो सौ-सौ वर्ग गज वाले छोटे भवन स्वामियों से उगाही कर ली जाती हैं।

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