साइकिल पर सवार नेता जी की नीतियां कहीं बिगाड़ न दें रणनीति Aligarh news

नीतियां तभी कारगर होती हैं जब रणनीति सही हो। ये बात साइकिल पर सवार नेताजी समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाहते। संगठन की मजबूती को दूसरे दलों के विस्थपित साइकिल पर सवार ताे कर लिए लेकिन उनकी नीतियों को संगठन के मुताबिक ढाल न सके।

Anil KushwahaThu, 22 Jul 2021 06:32 AM (IST)
सपाइयों ने तहसील पर पार्टी की नीतियों के विरुद्ध प्रदर्शन किया था।

अलीगढ़, जेएनएन।  नीतियां तभी कारगर होती हैं, जब रणनीति सही हो। ये बात साइकिल पर सवार नेताजी समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाहते। संगठन की मजबूती को दूसरे दलों के विस्थपित साइकिल पर सवार ताे कर लिए, लेकिन उनकी नीतियों को संगठन के मुताबिक ढाल न सके। यही वजह है कि विस्थापितों की नीतियां संगठन की नीतियों पर भारी पड़ रही हैं। अब तो यह स्पष्ट नजर आने लगा है। आयोजनों में गुटबंदी हावी हो रही है। सभी खुद को साबित करने में लगे हैं। कोई किसानों को साध रहा है तो कोई कम्यूनिटी को। छह महीने में बदलाव की चेतावनी अफसरों को देने से भी नहीं चूक रहे। तहसील पर पार्टी की नीतियों के विरुद्ध प्रदर्शन हुआ था। ''''गांव की सरकार'''' गंवाने के बाद बदलाव जरूरी हो गया है। अब लक्ष्य विधानसभा है। नीतियां एक मंच पर नहीं आईं ताे लक्ष्य पाने को बनी रणनीति फेल हो सकती है।

साझेदारों की बिखर गई टीम

सफाई महकमे में साझेदारों की मजबूत टीम बिखर गई है। सुख-दुख के इन साझेदारों में कुछ ताे सरकारी आदेश पर शहर छोड़ गए तो कुछ का मन न लगा तो किनारा कर लिया। जो बचे हैं, वे नया ठिकाना तलाश रहे हैं। इस टीम पर अफसरों को पूरा भरोसा था, इतना कि सभी महत्वपूर्ण काम इन्हीं को सौंपे जाते। जो टास्क मिलता था, ये टीम पूरा भी करती। पुराने साहब तो इस टीम के गुणगान का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। अब ये टीम बिखर रही है। इनका बिछुड़ना जरूरी भी हो गया था। दरअसल, इनके टीम वर्क को लाेग संदेह की दृष्टि से देखने लगे थे। कुछ ने तो शिकायत भी कर दी। इंटरनेट मीडिया पर कमेंट किए जाने लगे। साझेदारी खतरे में पड़ जाए, इससे अच्छा है किनारा ही कर लें, शायद यही सोचकर टीम अलग हाे गई। इस टीम के बिखरने के बाद नई टीम तैयार हो रही है।

उजाले पर नहीं बनी सहमति

आगरा की ओर जाने वाले हाईवे को रोशन करने के लिए सहमति नहीं बन पा रही। तीन साल से कवायद चल रही है। लेकिन, विभागीय अफसर कोई निर्णय नहीं ले पा रहे। पहले बजट के अभाव से योजना फेल हो गई। फिर अधिक बजट बताकर टेंडर निरस्त करा दिया गया। अब जो बजट जारी हुअा है, उसे काफी कम बताकर आपत्ति लगा दी गई है। कोई फर्म इतने में हाईवे को रोशन करने के लिए तैयार नहीं है। इनका कहना है, इतने बजट में क्या लेंगे और क्या देंगे। सही भी है, बिना दिए काम मिलेगा नहीं। कम बजट में काम किया कुछ बचेगा नहीं। अब बजट बढ़वाने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, सलाहकारों के सुझाव कुछ और ही हैं। सलाहकारों का कहना है नया टेंडर निकालने से लाभ नहीं। शहरभर का टेंडर जिसे मिला है, उसे ही जिम्मेदारी दे दी जाए। इस सलाह पर भी अफसरों का मंथन चल रहा है।

आशा पर भारी पड़ी आशंका

पूरे कोरोना काल में नालों की सफाई कराने में जुटे रहे अफसरों को आशा थी कि अब मानसून में जलभराव नहीं होगा। कहीं हुआ भी तो पानी जल्द ही निकल जाएगा। लेकिन, कुछ आशंकाएं भी थीं, जो शहर की भौगोलिक स्थिति और ऊंची न हो सकीं सड़कों को देखकर जोर मार रही थीं। बारिश हुई तो आशाओं ने दम ताेड़ दिया और आशंकाएं सच साबित हुईं। जोरदार बारिश में वे इलाके भी जलमग्न हो गए, जहां बीते साल पानी नहीं भरा था। ऐसे हालातों के लिए महकमा भी जिम्मेदार है। अफसरों ने नालों की सफाई पर जोर दिया, लेकिन पोखरों की सफाई और क्षमता बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया। चोक पड़ी सीवर लाइन खुलवाई नहीं गईं। नालों के निर्माण कार्य पूरे नहीं कराए गए। प्रमुख नालों की सफाई में बरती गई लापरवाही भी जलभराव की बड़ी वजह है। जलभराव पर समीक्षा होनी चाहिए, जिम्मेदारी भी तय की जाए।

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