आसान नहीं था, फिर भी जीती पोलियो से जंग, जानिए पूरा मामला Aligarh news

दो बूंद जिंदगी की’ यानि पोलियो से बचाव के लिए 0-5 साल तक के बच्चों को दी जाने वाली ड्राप्स। नई पीढ़ी भले ही दिव्यांगता से जुड़ी बीमारी की भयावहता से परिचित न हो लेकिन एक समय ऐसा था जब यह बीमारी सैकड़ों बच्चों के लिए अभिशाप बन गई थी।

Anil KushwahaSun, 24 Oct 2021 05:55 AM (IST)
पोलियो ड्राप ने हमारी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित कर दिया।

अलीगढ़, जागरण संवाददाता।  ‘दो बूंद जिंदगी की’ यानि पोलियो से बचाव के लिए 0-5 साल तक के बच्चों को दी जाने वाली ड्राप्स। नई पीढ़ी भले ही दिव्यांगता से जुड़ी इस बीमारी की भयावहता से परिचित न हो, लेकिन एक समय ऐसा था जब यह बीमारी सैकड़ों बच्चों के लिए अभिशाप बन गई थी। 1995 में पोलियो के खिलाफ सरकार ने जंग शुरू की। माइक्रोप्लान बनाकर टीमों को उतारा गया। परिणाम सबसे सामने है।

2009 में मिले थे पीवी-1 व पीवी-3 के अंतिम केस

पोलियो का अंतिम केस (पीवी-2) अतरौली के गांव गनियावली में 24 अक्टूबर 1999 को सामने आया था। पीवी-3 का अंतिम केस जवां ब्लाक के गांव मंजूरगढ़ी में 20 दिसंबर 2009 व पी-1 का अंतिम केस 23 मई 2009 को अकर्बाद ब्लाक के गांव पिलखना में सामने आया। तब से जनपद में किसी श्रेणी का केस नहीं मिला।

बेहतर माइक्रोप्लान से दी मात

जिले में 1995 से 1999 तक साल में दो बार दवा पिलाई जाती थी। 2000 से 2002 तक साल में छह बार, 2003 से 2005 तक साल में सात बार, 2005 से 2011 तक साल में नौ बार पोलियो ड्राप्स पिलाई गई। शून्य से पांच साल तक के 6.30 लाख बच्चों को हर राउंड में दवा पिलाई जाती थी। पड़ौसी देशों में पोलियो खत्म न होने के कारण अभियान पूरी तरह खत्म नहीं किया है। वर्तमान में साल में एक या दो बार ही दवा पिलाई जाती थी। जनवरी 2021 में छह लाख 17 हजार 20 बच्चों को दवा पिलाई गई।

ये था माइक्रोप्लान

जिला प्रतिरक्षण अधिकारी डा. एमके माथुर ने बताया कि शहर से लेकर देहात तक सेक्टर बनाए जाते थे। एएनएम के नेतृत्व में तीन सदस्यीय टीम गठित होती थी। एक स्थानीय व्यक्ति को बतौर वालंटियर दैनिक भत्ते पर शामिल किया जाता था। टीम घर-घर जाकर दवा पिलाती थी। वालंटियर लोगों को समझाने में भी सहयोग करता था। सुपरवाइजर हर टीम के कार्य का निरीक्षण करते थे। कोई परेशानी होने पर उच्चाधिकारियों को अवगत कराकर समाधान कराया जाता था। कई बार गलत भ्रांतियां फैलने से लोग दवा नहीं पिलाते थे, जिन्हें समझाया जाता था। शाम को मीटिंग होती थी।

ड्राप को बचाने के लिए जमवाते थे बर्फ

उप जिला प्रतिरक्षण अधिकारी शरद अग्रवाल बताते हैं कि सुबह चार बजे तक आइस बाक्स में दवा सुरक्षित करके केंद्रों पर पहुंचा दी जाती थी। यहां से वाहनों के जरिए, क्षेत्रों में भेजी जाती थीं। कई बार सरकारी वाहन न मिलने पर बसों, स्कूटरों व बाइक से भी दवा भेजनी पड़ी थी। गर्मियों के मौसम में टीमें उत्साह से काम करती थीं। गर्मी में आइसपैक पिघलने लगते थे, ऐसे में आसपास के कोल्ड स्टोर में बर्फ जमवानी पड़ती थी। बस अड्डों, रेलवे स्टेशन व चौराहों पर भी टीमें नियुक्त की जाती थीं। डोर-टू-डोर अभियान से पूर्व बूथ दिवस का आयोजन होता था। रैलियां निकाली जाती थीं।

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