आरएसएस में प्रचारक की अहम भूमिका, ऐसे होती है परीक्षा Aligarh News

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक की अहम भूमिका होती है। प्रचारक ही संघ की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। ये संघ के साथ ही विविध क्षेत्र में कार्य करते हैं। भाजपा में भी वो संगठन मंत्री के रुप में कार्य करते हैं। इनका रुतबा मंत्रियों से भी ऊंचा होता है।

Sandeep Kumar SaxenaFri, 30 Jul 2021 11:05 AM (IST)
प्रचारक ही संघ की सबसे बड़ी ताकत होते हैं।

अलीगढ़, जेएनएन। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक की अहम भूमिका होती है। प्रचारक ही संघ की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। ये संघ के साथ ही विविध क्षेत्र में कार्य करते हैं। भाजपा में भी वो संगठन मंत्री के रुप में कार्य करते हैं। इनका रुतबा मंत्रियों से भी ऊंचा होता है। मंत्री भी इनके आगे-पीछे लगे रहते हैं। मगर, प्रचारक बनने के लिए कठिन परीक्षा से होकर गुजरना पड़ता है।

ऐसे होती है प्रचारक की परीक्षा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। महान देशभक्त डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। वो अविवाहित थे। उन्होंने ही प्रचारक की पंरपरा की शुरुआत की थी। संघ में प्रचारक अविवाहित ही रहते हैं। इसलिए पहली ही शर्त बहुत कठिन है, मगर देश के प्रति समर्पित तमाम ऐसे लोग हैं, जो सहर्ष प्रचारक बनने को तैयार रहते हैं और अपना पूरा जीवन देश के लिए समर्पित कर देते हैं। आरएसएस में प्रचारक की लंबी श्रृंखला है। मगर, प्रमुख प्रचारकों का परिचय जिससे उनके महान कार्य के बारे में समझा जा सकेगा। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल भी संघ में प्रचारक थे। जिला और विभाग प्रचारक के बाद वो विहिप में पहुंचे थे। इसके बाद उन्होंने विहिप के माध्यम से राम मंदिर आंदोलन को एक नई पहचान दी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी संघ की देन हैं। वह भी प्रचारक रहे। विभिन्न दायित्वों पर रहते हुए जनसंघ और भाजपा में पहुंचे और फिर देश के प्रधानमंत्री बने। पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी संघ के प्रचारक रहे। जनसंघ के संस्थापक सदस्य भी रहें। उनके स्वभाव और कार्य के प्रति हर कोई परिचित है। एकात्म मानववाद का नारा उन्होंने ही दिया था। प्रोफेसर राजेंद्र सिंह रज्जू भैया तो बालकाल्य से संघ के संपर्क में आ गए थे। पूरा जीवन संघ को समर्पित कर दिया था। देश के महान वैज्ञानिकों में उनकी गिनती थी,उन्हें कई बार शोध के लिए बुलाया गया, मगर वो लौटे नहीं, उन्होंने कहा था कि एक जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित है। उसके बाद आगे कुछ देखा जाएगा। भाजपा के संगठन मंत्री रहे रामलाल भी प्रचारक हैं। वह भी खंड, नगर, जिला, विभाग, प्रांत प्रचारक होते हुए आगे बढ़े और भाजपा में अखिल भारतीय संगठन मंत्री तक पहुंचे। उनके कार्यकाल में भाजपा केंद्र और प्रदेश में सत्ता में आई। अब रही बात प्रचारक कैसे बनते हैं। इसके लिए नियमित शाखा जाना होता है। संघ स्थान से जुड़ाव के बाद संघ के पदाधिकारियों की नजर रहते है, वो अच्छी तरह से जांचते और परखते हैं। फिर संघ का प्रशिक्षण करना होता है। प्राथमिक संघ शिक्षा वर्ग एवं संघ शिक्षा वर्ग प्रथम वर्ष अनिवार्य है। हालांकि, कई बार इसी प्रशिक्षण के बीच ही स्वयंसेवक को प्रचारक के लिए निकाल दिया जाता है। उन्हें पहले नगर आदि में प्रशिक्षित किया जाता है, फिर धीरे-धीरे जिम्मेदारी दी जाती है। संघ के प्रचारक शादी नहीं कर सकते हैं। उन्हें अपने घर-परिवार से भी दूर रहना पड़ता है। अपने परिवार-सगे संबंधियों को कोई लाभ आदि भी नहीं पहुंचाते। संत की तरह प्रचारकों का जीवन होता है। तमाम कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है। अब तो संचार माध्यम मजबूत हुआ है, पहले तो प्रचारकों को कई कई दिनों तक भूखा रहना पड़ता था, लोगों से संपर्क बनाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती थी।

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