देसी पौधों से नहीं आई हरियाली, अलीगढ़ में अभी भी विदेशी पौधों की बहार

पौधरोपण अभियान के समय भले ही देसी पौधे रोपे जाने की बात कही जाती हो मगर अभी भी विदेशी पौधों की हर जगह बहार है। पर्यावरणप्रेमी सुबोध नंदन शर्मा का कहना है जबतक पौधों की नर्सरी में देसी पौधों पर जोर नहीं दिया जाएगा तबतक विदेशी पौधे दिखाई देंगे।

Anil KushwahaMon, 29 Nov 2021 03:22 PM (IST)
नर्सरी में देसी पौधों को बढ़ावा देने की जरूरत है।

अलीगढ़, जागरण संवाददाता।  पौधरोपण अभियान के समय भले ही देसी पौधे रोपे जाने की बात कही जाती हो, मगर अभी भी विदेशी पौधों की हर जगह बहार है। पर्यावरणप्रेमी सुबोध नंदन शर्मा का कहना है कि जबतक पौधों की नर्सरी में देसी पौधों पर जोर नहीं दिया जाएगा, तबतक विदेशी पौधे तरफ दिखाई देंगे। नर्सरी में देसी पौधों को बढ़ावा देने की जरूरत है।

पर्यावरण को लेकर समाजसेवी चिंतित

धरती पर पर्यावरण असंतुलन को देखते हुए पर्यावरणप्रेमी खासे चिंतित हैं। पूरी दुनिया में इसमें चिंतन और मनन चल रहा है। इसे देखते हुए प्रदेश में भी पौधरोपण अभियान चलाया जाता है। जुलाई और अगस्त में व्यापक रुप से अभियान भी चलाया जाता है। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद से देसी पौधे लगाने पर जोर दिया गया था। हालांकि, तमाम सामाजिक संगठन देसी पौधे लगाने के लिए आगे आए भी हैं। इसलिए आंवला, नीम, केला, कटहल, जामुन आदि पौधे लगाए जाने लगे। मगर, सीजन के समय में इनके पौध नहीं मिलते हैं। इससे इस बार भी जुलाई और अगस्त में इन पौधों के रोपने में दिक्कत आई। पर्यावरणविद् सुबोधनंदन शर्मा ने कहा कि जिले में 100 से अधिक नर्सरी हैं। इन नर्सरियों में अधिकांश वेिदेशी पौधे ही रहते हैं।

नर्सरी वालों को नहीं किया जाता प्रोत्‍साहित

नर्सरी वालों को कभी प्रोत्साहित नहीं किया जाता है कि वह आंवला, नीम, कटहल, जामुन आदि पौधों को तैयार करें। इससे ये पौधे तैयार नहीं हो पाते हैं। पौधरोपण अभियान के समय मजबूरी में लोग विदेशी पौधे लगा देते हैं। घरों में भी लोग विदेशी पौधों को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे हालात में कैसे देसी पौधे जिले में दिखेंगे। इसलिए सड़कों पर आज भी विदेशी पौधे मुराया, सीमाली आदि पौधे लोग घरों में लगाते हैं। सुबोधनंदन शर्मा ने कहा कि यदि नर्सरी आने वाले दिनों में तैयार नहीं की गई तो इसी तरह से शहर में विदेशी पौधे ही दिखाई देंगे। इन पौधों पर कोई पक्षी नहीं बैठते हैं। चीटियां आदि भी नहीं दिखाई देती हैं। इनके पत्ते आदि भी बकरी और पशु नहीं खाते हैं। यहां तक कि इनकी लकड़कियां भी काम में नहीं आती हैं। ऐसे में ये पौधे पूरी तरह से बेकार होते हैं। यह पर्यावरण के लिए भी बेहद नुकसानदाय होता है।

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