सियासत के अखाड़े में वर्षों से चल रही पोखरों पर लड़ाई, परिणाम शून्य Aligarh news

जल संचयन का मुख्य स्रोत पोखर तालाबों पर कब्जों के विवाद वर्षों पुराने हैं। इन विवादों की पैरवी करते-करते कई अधिकारियों के तबादले हो गए कई सेवानिवृत्त हो चुके हैं लेकिन विवाद खत्म नहीं हुए। शहरी क्षेत्र में पोखरों का स्वामित्व नगर निगम के पास है।

Anil KushwahaTue, 15 Jun 2021 01:43 PM (IST)
जल संचयन का मुख्य स्रोत पोखर, तालाबों पर कब्जों के विवाद वर्षों पुराने हैं।

अलीगढ़, जेएनएन ।  जल संचयन का मुख्य स्रोत पोखर, तालाबों पर कब्जों के विवाद वर्षों पुराने हैं। इन विवादों की पैरवी करते-करते कई अधिकारियों के तबादले हो गए, कई सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुए। शहरी क्षेत्र में पोखरों का स्वामित्व नगर निगम के पास है, इसीलिए मुकदमों में वही पैरवी कर रहा है। रिकार्ड के मुताबिक शहरी सीमा में 21 पोखरें हैं, इनमें से पांच पर अब भी अतिक्रमण है। दो पोखरों से अतिक्रमण हटाया जा चुका है। पांच पोखरों पर मुकदमे विचाराधीन हैं। अब निगम सीमा में नए क्षेत्र भी शामिल हो चुके हैं। इनमें 10 पोखरें हैं, छह पर कब्जा है। अब नगर निगम को इनके मुकदमे भी लड़ने पड़ रहे हैं। नये क्षेत्रों की पोखरें मिला लें तो कुल 31 पोखरें हैं। इनके अलावा भी कुछ पोखर, तालाब हैं, जिनका रिकार्ड ही नहीं है। वर्षों पहले ही वहां आबादी बस चुकी है। साबित अली का तालाब इन्हीं में से एक है।

रावण टीला पोखर का विवाद चर्चा में

वर्तमान में रावण टीला पोखर का विवाद चर्चाओं में है। नगर निगम अधिकारियों के दावों को सच माने तो यह प्रकरण भी गूलर रोड पोखर प्रकरण से मिलता-जुलता है। गूलर रोड पर मछली पालन के लिए दी गई सलेज फार्म की भूमि की कास्तकारों ने पावर अर्टानी कर दी। इसके जरिए फर्जी बैनामे हुए थे। इस बेशकीमती भूमि को कौड़ियों के भाव बेच दिया गया। नगर निगम भी तब चेता जब वहां आबादी बस गई। हालांकि, भारी विरोध झेलकर पोखर की भूमि का काफी हिस्सा कब्जा मुक्त करा लिया गया। लेकिन, बाकी हिस्सा यूं ही पड़ा है। मामला कोर्ट में विचाराधीन है। रावण टीला पोखर के मामले में भी ऐसा ही बताया जा रहा है। निगम अधिकारियों का कहना है कि ये भूमि भी मछली पालन के लिए पट्टे पर दी गई थी। पावर अर्टानी के लिए बैनामे करा दिए गए। अब ये लोग पोखर पर अपना स्वामित्व बता रहे है। ये प्रकरण भी कोर्ट में विचाराधीन है। दोनों पक्ष 2018 से लगातार पैरवी कर रहे हैं। मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया था। हाईकोर्ट ने लाेअर कोर्ट में ही विवाद निपटाने के आदेश दे दिए। कोर्ट का फैसला आने से पहले ही विवाद शुरू हो गया है।

क्‍या कहत है दूसरा पक्ष

दूसरे पक्ष का कहना है कि नगर निगम पोखर की सफाई के बहाने उनकी भूमि पर कब्जा ले रहा है। सत्ताधारी नेता भी इस विवाद में कूद पड़े हैं। प्रकरण में हस्तक्षेप कर रहे तीसरे पक्ष का कहना है कि जब मामला कोर्ट में विचाराधीन है तो कोर्ट के फैसले का इंतजार कर लिया जाए। बात सही है, लेकिन कुछ लोग तो इस पर भी टिप्पणी कर रहे हैं। कह रहे हैं कि कोर्ट के फैसले जल्दी हो जाते तो विवाद लंबे समय तक बना न रहता।

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