Aligarh Police Doctor Fight Case : सीमाएं तो याद रखनी होंगी, पुलिस ने ऐसे ही सिंघम रूप नहीं दिखाया

दो पक्षों में विवाद होने पर सुलझाने के लिए पुलिस को ही बुलाया जाता है।

दो पक्षों में विवाद होने पर सुलझाने के लिए पुलिस को ही बुलाया जाता है। बहुत से केसों में समझौता हो जाता है तो कुछ में मुकदमा। झगड़ रहे लोगों के बीच पुलिस ही हाथ-पैर चलाने लग जाए तो माहौल सुधरने की बजाय बिगड़ता ही है।

Sandeep kumar SaxenaSun, 28 Feb 2021 07:15 AM (IST)

अलीगढ़, जेएनएन।  दो पक्षों में विवाद होने पर सुलझाने के लिए पुलिस को ही बुलाया जाता है। बहुत से केसों में समझौता हो जाता है तो कुछ में मुकदमा। झगड़ रहे लोगों के बीच पुलिस ही हाथ-पैर चलाने लग जाए तो माहौल सुधरने की बजाय बिगड़ता ही है। केके हॉस्पीटल और तीमारदारों के बीच हुई मारपीट में पुलिस की हुई इंट्री में कुछ ऐसा ही दिखा। परंतु, कभी-कभी हालत ऐसे भी बन जाते हैं कि पुलिस को झगड़ रहे लोगों के बीच अपने होने का अहसास कराना भी पड़ता है। अस्पताल के सीसीटीवी देखकर लगता भी है कि पुलिस ने ऐसे ही सिंघम रूप नहीं दिखाया। फिर भी संयम से काम लेने की जरूरत थी। अस्पताल और तीमारदार जिस तरह से लड़ते हुए कैद हुए हैं वो भी सही नहीं है। इससे एक दूसरे के रिश्ते की डोर ही कमजोर होती है। एक दूसरे के धर्म को नहीं भूलना चाहिए। 

ऐसी नौबत ही क्यों

डाक्टर तो धरती का भगवान होते हैं। ये नाम उन्हें मरीजों की सेवा से ही मिला है। डाक्टरों के लिए मरीजों से बढ़कर कुछ हो नहीं सकता है। मरीजों के बेहतर इलाज और सेवा से उनको भी पहचान मिलती है। बहुत से ऐसे डाक्टर भी हैं जो मरीजों की आर्थिक मदद तक करते हैं, लेकिन वो अपना नाम कभी सामने नहीं आने देते। डाक्टर और तीमारदारों के बीच जब पैसे को लेकर मारपीट की घटनाएं होती हैं तो व्यवस्था पर ही सवाल खड़े होते हैँ। कुछ डाक्टरों ने तो बाउंसर रख लिए हैं। कुछ विवाद तो उनके कारण भी होते हैं। अस्पतालों में ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए। दोनों ओर से ही धैर्य से काम लिया जाना चाहिए। मारपीट से किसी का भला नहीं हो सकता। अस्पताल का विवाद जब सड़क पर नहीं आएगा तो पुलिस को भी बुलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।  आइएमए को इस पर मंथन करना होगा।

तह में तो जाना होगा 

केके हास्पीटल में डाक्टर व तीमारदारों के बीच हुई घटना कोई नई नहीं हैं। पहले भी कई अस्पतालों में ऐसा हो चुका है। कहीं अस्पताल का स्टाफ पिटा तो कहीं तीमारदार। पिछले तीन-चार साल से ऐसी घटनाओं में इजाफा ज्यादा हुआ है। आखिर ऐसी नौबत आती ही क्यों है? इसकी तह में जाने की जरूरत है। अधिकांश विवाद पैसे को लेकर ही होते हैं। क्या इलाज में होने वाले खर्च के बारे में तीमारदार को सही से बताया नहीं जाता? या, तीमारदार मुकर जाते हैं। दोनों ही गंभीर मामले हैं। अब गेंद पुलिस के पाले में है। सही से जांच होने की जरूरत है। ताकि सच सामने आ सके। क्योंकि इस घटना को लेकर शहर के डाक्टरों को कामकाज बंद कर सड़क पर उतरना पड़ा। अस्पताल में इलाज न मिलने से मरीाजें को परेशानी झेलनी पड़ी। रामघाट रोड पर जाम लगाने से शहर के लोगों को दिक्कत झेलनी पड़ी।

खूब लुट रहा प्यार 

नुमाइश ढलान की ओर है। वसूली का अभियान भी तेज हो गया है। वीआइपी मार्ग के फुटपाथ पर दुकान पहले से ज्यादा सज गई हैं। हुल्लड़ बाजार में धमाल अपने शबाब पर है। भीड़ भी रिकार्ड तोड़ उमड़ी रही है, लेकिन कोहिनूर मंच पर इस बार विधायक कम नजर आ रहे हैं। सांसद जरूर कई कार्यक्रमों में दीप जला जा चुके हैं। विधायकों का मंच पर न पहुंचना चर्चा का विषय हो सकता है। बड़ी चर्चा ये बनी हुई है इस जिम्मेदारी को विपक्ष खूब निभा रहा है। कलाकारों को सम्मान देने की बात हो या फिर कार्यक्रमों में पहुंचने की। विपक्षी पार्टी के एक नेताजी तो नुमाइश के इंटरनेट मीडिया एकाउंट पर छाए हुए हैं। भाई से दोस्ती के नाम पर इनके खूब फोटो डाले जा रहे हैं। इससे सत्ता पक्ष के नेताओं के पेट में दर्द होना तय है। आपस में इस पर चर्चा कर भी रहे हैं।

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