Aligarh Municipal Corporation: मौन रहे मुखिया, साहब छोड़ गए सदन, विस्‍तार से जानिए मामला

विकास पुरुष ने जिस खाई को पाटकर इंजीनियर साहब के लिए रास्ता बनाया था वो खाई फिर गहरी होती जा रही है। रास्ते में दरार भी पड़ने लगी हैं। ऐसी परिस्थितियों में जनहित के लिए तय किया सफर मुश्किल भरा साबित हो रहा है।

Sandeep Kumar SaxenaThu, 14 Oct 2021 11:35 AM (IST)
'सदन' के सदस्यों का प्रस्ताव 'इंजीनियर साहब' को नहीं भाया।

अलीगढ़, जागरण संवाददाता। 'विकास पुरुष' ने जिस खाई को पाटकर 'इंजीनियर साहब' के लिए रास्ता बनाया था, वो खाई फिर गहरी होती जा रही है। रास्ते में दरार भी पड़ने लगी हैं। ऐसी परिस्थितियों में 'जनहित' के लिए तय किया सफर मुश्किल भरा साबित हो रहा है। 'सदन' में मंगलवार को हुए हंगामे ने यह साबित भी कर दिया। 'सदन' तो सड़क, सफाई, पानी और पथ प्रकाश की मुश्किलें आसान करने के लिए जुटा था, लेकिन मुद्दा कुछ और ही छिड़ गया। 'सदन' के सदस्यों का प्रस्ताव 'इंजीनियर साहब' को नहीं भाया। उनकी आपत्ति जायज थी। घूमने-फिरने की स्वीकृति सदस्यों के लिए थी, परिवार के लिए नहीं। मगर, सदस्यों को कौन समझाए। मंच पर बैठे 'मुखिया' सदस्यों के आगे पहले ही हथियार डाल चुके थे। उन्हें मौन देख 'इंजीनियर साहब' खुद को असहज महसूस करने लगे। फिर क्या था, सदस्यों के व्यवहार से तमतमाए 'इंजीनियर साहब' सदन बीच में ही छाेड़कर चले गए।

स्मार्ट सिटी ने बांट दिया शहर

तालों की इस नगरी मेें 'स्मार्ट सिटी' के कदम क्या पड़े, शहर का बंटवारा हो गया। एक शहर पुल के पार, जहां वीवीआइपी मूवमेंट रहता है और दूसरा इधर, जो पुराने बाजार-मंडियों के लिए चर्चित है। ऐतिहासिक घंटाघर दोनों हिस्सों में हैं। एक विकसित हो गया, दूसरा आस्तित्व बचाने की जिद्दोजहद कर रहा है। वीवीआइपी मूवमेंट वाले हिस्से की तरक्की देख बाजार-मंडियां खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। भीड़भाड़, ट्रैफिक, जाम की समस्याओं से जूझना जो पड़ रहा है। प्रबंधन के पक्षपात की हद तो देखिए, दिक्कतों से जूझ रहे पुराने शहर में कराए गए विकास कार्य मानकों पर खरे नहीं उतर रहे। जो सड़कें बनाई गईं, वे बारिश में धुल गईं। गड्ढा मुक्त सड़क के अभियान में औपचारिकता ही निभाई गई। न सफाई व्यवस्था पटरी पर आ सकी, न ही पथ प्रकाश को लेकर कोई ठोस कदम उठाए गए। जबकि, कागजों पर सब ठीक है।

कतार में खड़े टिकट के तलबगार

चुनाव का बिगुल जबसे बजा है, सियासी गलियारों में हलचल मची हुई है। साइकिल वाले भैयाजी को इस चुनाव से खासा उम्मीद है। भैयाजी की उम्मीदों ने तमाम पार्टीजनों में अाशा जगा दी है। यही वजह है कि टिकट के तलबगारों की कतार लंबी होती जा रही है। इस कतार में पूर्व माननीय तो खड़े ही हैं, जिलाध्यक्ष, पूर्व जिलाध्यक्ष और कई नए पदाधिकारी भी किस्मत आजमा रहे हैं। रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने और बिछड़ों को गले लगाने का दौर तेज हो चला है। कोई पानी पिलाकर समर्थन हासिल कर रहा है तो कोई कमजोरों को शिक्षित बनाने का भरोसा दिलाकर सहयोग मांग रहा है। ठाकुर साहब तो पुराने सिद्धांत ही अपनाए हुए हैं। बुर्जुगों के पैरों में माथा टेककर आशीर्वाद ले रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो मौन साधे हुए हैं, कोई गतिविधि नहीं। इन्हें भी भरोसा है कि इस बार टिकट उन्हें ही मिलेगा। भैयाजी से संबंध जो मधुर हैं।

कागजों में जल रहीं स्ट्रीट लाइट

स्ट्रीट लाइट सड़कों पर नहीं, कागजों में जल रही हैं। स्ट्रीट लाइट के संबंध में आने वाली शिकायतों का दफ्तर में बैठे ही निस्तारण दिखा दिया जाता है। शिकायतकर्ता जब पुन: सेवाभवन पहुंचता है तो रजिस्टर में शिकायत निस्तारित देख हैरान रह जाता है। फिर कोई उसकी नहीं सुनता। अफसर भी रजिस्टर देखकर निर्णय ले लेते हैं। ये व्यवस्था किसी भी लिहाज से उचित नहीं कही जा सकती। कार्यकारिणी बैठक, बोर्ड अधिवेशन में इसी बदहाल व्यवस्था को मुद्दा बनाकर पार्षद आपत्ति करते हैं और हंगामा हो जाता है। विभागीय अफसर भी स्ट्रीट लाइट के लिए जिम्मेदार अफसरों को ऐसी बैठकों में नहीं बुलाते। जबकि, हर बार अगली बैठक में इनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जाते हैं। इसके पीछे अफसरों की क्या मंशा है, यह वही जाने। लेकिन, उनकी इस अनदेखी से आमजनों को काफी परेशानी हो रही है। रात के समय हादसों की संख्या में इजाफा भी हो रहा है।

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