Navratra 2021: आदिशक्ति की आराधना होती है इस पाठ को करने से पूर्ण, जानिए क्‍या है रहस्‍य

हर उपासना का समय व दिशा निश्चित है। देव उपासना का समय प्रातः है। देवी उपासना का समय रात है। दिशा है पश्चिममुख। पितर उपासना का समय है दोपहर के बाद। दिशा है दक्षिणमुख। जगदम्बा से सम्बंधित जितनी भी साधनाएं हैं उन्हें करने से पूर्व पीठ स्थापना करना आवश्यक है।

Prateek GuptaTue, 12 Oct 2021 12:47 PM (IST)
नौ दिन की आराधना में मां हरसिद्ध‍ि मनवांछित मनोकामना पूर्ण करती हैं।

आगरा, जागरण संवाददाता। शक्ति की आराधना का पर्व व्‍यक्ति के मन के भीतर की शक्ति को जाग्रत करने का अवसर देता है। नौ दिन की साधना स्‍वयं से स्‍वयं की पहचान करने के दिन है। शक्ति के इस अर्थ को शब्‍दों में पिरो पाना संभव नहीं है। नवरात्र में माता की साधना करने वाले साधक के मन में कई बार जिज्ञासाएं भी उत्‍पन्‍न होती हैं कि आखिर मां भगवती के नौ रूपों का अर्थ क्‍या है। इस बाबत देवी पुराण एवं शोध के आधार पर धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी का कहना है कि कोई भी शक्ति बिना आधार या आश्रय के प्रकट नहीं हो सकती। उसे कोई- न- कोई आधार चाहिए प्रकट होने के लिए। दुर्गा सप्‍तशती में देवी के हर रूप का वर्णन है। इसके हर श्‍लोक में देवी शक्ति की महिमा का बखान है। पाठ को करने से पूर्व इसके समय का विेशेेेेष ध्‍यान रखना चाहिए।

क्‍या है दुर्गा सप्‍तशती

तंत्राचार्यों ने दुर्गा से सम्बंधित स्तोत्र, पटल, पद्धति और कवच की रचना की। वे चाहते थे कि कोई ऐसी रचना हो जिसमें परमात्म शक्ति के आश्रय से तीनों शक्तियों: महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली का एक साथ समावेश हो। इसलिए उन्होंने सर्वप्रथम 'रात्रिसूक्त' और 'देवीसूक्त' की रचना की। सात सौ श्लोकों की रचना की जिनके माध्यम से देवी चरित्रों का वर्णन किया गया। वे श्लोक दुर्गा से सम्बंधित थे। इसीलिए इसका नाम दुर्गा सप्तशती रखा गया। इसे तीन भागों में विभक्त कर प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तम चरित्र के रूप में वर्णन किया गया है। प्रथम चरित्र में महाकाली का, मध्यम चरित्र में महालक्ष्मी का और उत्तम चरित्र में महासरस्वती का वर्णन है। पंडित वैभव कहते हैं कि दुर्गा शप्‍तशती के सात सौ श्लोकों को 13 अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम चरित्र में केवल पहला अध्याय है, मध्यम चरित्र में दूसरा, तीसरा और चौथा अध्याय है और उत्तम चरित्र में शेष अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में काली का बीजाक्षर रूप 'क्लीं' है। मध्यम चरित्र में लक्ष्मी का बीजाक्षर रूप 'ह्रीं' है और उत्तम चरित्र में सरस्वती का बीजाक्षर 'ऐं' है। इस तरह 'ऐं ह्रीँ क्लीं चामुण्डायै विच्चे', यह मन्त्र नवार्ण मन्त्र है। इसमें तीनों बीजाक्षरों को मिलाकर कुल नौ अक्षर हैं जो नौ दुर्गा का प्रतिनिधित्व करते हैं। तात्पर्य यह है कि नौ दुर्गा सामूहिक शक्ति है-वही नवार्ण मन्त्र की शक्ति है। मन्त्र जपने से और यंत्र लिखने से सिद्ध होता है। नवार्ण मन्त्र को नवरात्र में 9000 बार जपने से वह सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार नवार्ण यंत्र को 9000 बार लिखने से भी वह सिद्ध हो जाता है।

दुर्गा सप्‍तशती का पाठ रात में करें

हर उपासना का समय व दिशा निश्चित है। देव उपासना का समय प्रातः है। दिशा है उत्तरमुख। देवी उपासना का समय रात है। दिशा है पश्चिममुख। पितर उपासना का समय है दोपहर के बाद। दिशा है दक्षिणमुख। जगदम्बा से सम्बंधित जितनी भी साधनाएं हैं, उन्हें करने से पूर्व पीठ- स्थापना करना आवश्यक है। पीठ-स्थापना के समय 'ह्रीं श्रीं क्रीं हौं स्वाहा'- इस बीज मन्त्र का जप करना चाहिए। धूपबत्ती जलाना चाहिए। ब्रह्मचर्य, निराहार, एकान्त प्रवास-व्रत का पालन आवश्यक है। 11 दिन में 10000 जप पूरे कर लेने चाहिए। जप रात्रि में करना उत्तम है।

रात्रिसूक्‍त का पाठ

पंडित वैभव कहते हैं कि दुर्गा सप्‍तशती में वर्णित रात्रिसूक्‍त सबसे महत्वपूर्ण अंग है। यह सिद्ध पाठ है। इस जगत के एक-एक अणु में कम्पन है। उसी कम्पन से यह जगत शब्दायमान हो रहा है। इसी को 'अनहद नाद' कहते हैं। जब तक साधक अनहद नाद सुन नहीं लेता तब तक उसकी साधना अधूरी है। इसके श्रवण के बाद ही साधक अंतर्जगत में प्रवेश कर सकता है।

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