International Mother Language Day: अपनी ही जमीन औेर लोगों के बीच बिसरती दुनिया की सबसे मीठी बोली ब्रज भाषा

ब्रजभाषा की मिठास को देखते हुए भक्ति और रीति काल में तमाम काव्‍य ग्रंथों की रचना की गई।

एक शताब्दी पहले लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया में जार्ज अब्राहम गिर्यसन ने ब्रजभाषा को दिया था दुनिया की सबसे मीठी बोली का खिताब। ब्रजभाषा में साहित्य लेखन वाले गिने-चुने लोग ही रह गए हैं। आगरा के चौधरी सुखराम सिंह को ब्रज के गीतों का राजकुमार कहा जाता था।

Prateek GuptaSun, 21 Feb 2021 09:09 AM (IST)

आगरा, अली अब्‍बास। माई री माई तोरी सांकरी गली में मोरे कांकरी चुभत। एक शताब्दी पहले भारतीय भाषाई सर्वेक्षण कराने वाले अंग्रेज विद्वान जार्ज अब्राहिम गिर्यसन ने ब्रजभाषा को दुनिया की सबसे मीठी बोली होने का खिताब दिया था। ये खिताब देते समय जार्ज ने इस छंद का जिक्र किया है। अपने भ्रमण के दौरान एक गांव में उन्होंने बेटी को मां से इस अंदाज में शिकायत करते सुना था। आज वही ब्रजभाषा अपनी ही जमीन और लोगों के बीच बिसरती जा रही है। ब्रज क्षेत्र में जो ब्रजभाषा कभी लोगों की जुबान और दिलों पर राज करती थी। संरक्षण की दिशा में कोई ठोस कदम न उठाने से अपनों के बीच ही बेगानी हो चली है।

सेंट जोंस कालेज के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष व हिंदी भाषा के विद्वान डाक्टर श्री भगवान शर्मा कहते हैं क्षेत्रीय भाषा के प्रतिनिधि के रूप में हम हिंदी को मातृभाषा मानते हैं। इसमें ब्रज, अवधि, कन्नौजी व छत्तीसगढ़ी भाषा हैं। इन सबको हिंदी की सहयोगी बहन मानते हैं। जार्ज अब्राहिम गिर्यसन ने ब्रज भाषा को दुनिया की सबसे मीठी बोली का खिताब दिया था। डाक्टर श्रीभगवान शर्मा के मुताबिक भक्ति काल और रीतिकाल ब्रजभाषा का स्वर्णिम काल माना जाता है। भक्ति काल का सारा साहित्य ब्रजभाषा में लिखा गया है।

भक्ति काल का समय वर्ष 1375 से वर्ष 1700 तक माना जाता है। वहीं, रीतिकाल का समय वर्ष 1700 से वर्ष 1900 तक माना जाता है। अाधुनिक काल में भी जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चचंद्र, सूयकांत त्रिपाठी निराला, मैथिली शरण गुप्त आदि ने ब्रजभाषा में भी साहित्य सृजन किया है। मथुरा में होली गेट से लेकर छाता बाजार तक के इलाके में ब्रज भाषा के कवियों की तूती बोलती थी। आगरा के चौधरी सुखराम सिंह को ब्रज के गीतों का राजकुमार कहा जाता था। आगरा, मथुरा, फीरोजाबाद, मैनपुरी, भरतपुर, अलीगढ़, हाथरस, एटा व कासगंज की पट्टी में ब्रजभाषा की पट्टी है।आज भाषा का संबंध रोजगार से जोड़ा जाता है। ब्रजभाषा को रोजगार से न जोड़े जाने के कारण धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है।

ब्रजभाषा को सहेजने की कोशिश

वर्तमान में भी कई कवि और साहित्यकार ब्रजभाषा को सहेजने का काम कर रहे हैं। इनमें सोम ठाकुर, रामेंद्र मोहन त्रिपाठी, डाक्टर शशि तिवारी, राज बहादुर, पूर्व विधायक बदन सिंह, राजकुमार रंजन, ब्रज बिहारी लाल बिरजू, डाक्टर केशव शर्मा, डाक्टर त्रिलोकीनाथ प्रेमी आदि हैं। अागरा कालेज के पूर्व विभागाध्यक्ष त्रिलोकीनाथ प्रेमी आज भी बोलचाल में ब्रजभाषा का प्रयोग करते हैं।

क्या कहते हैं साहित्य सेवी

एक जमाना वह था जब तक कवि ब्रजभाषा में नहीं लिखता था, उसे कवि नहीं माना जाता था। आज की पीढ़ी कान्वेंट में पढ़ने लगी है। उसका हिंदी भाषा से संबंध कम होता जा रहा है। हालांकि गांवों से शहर आकर बसे पुराने लोग ब्रजभाषा को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

सोम ठाकुर कवि

अाधुनिक शिक्षा का प्रचलन बढ़ा है। इसमें बच्चों को देहात या घर की भाषा बोलने में हीनभावना लगती है।वह घर में अंग्रेजी या हिंग्लिश बोलना चाहते हैं। दूसरा कारण शहर और गांव में रहने वाली पुरानी पीढ़ी का खत्म होना है। पुरानी पीढ़ी घर और अपनों से बातचीत में ब्रजभाषा का प्रयोग करती थी।

रानी सरोज गौरिहार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व लेखिका

ब्रज के होते हुए भी हम घर में ब्रजभाषा में बातचीत नहीं करते। इसके चलते नई पीढ़ी ब्रजभाषा से अपरिचित हो रही है। वह ब्रजभाषा के कवियों को भी नहीं पढ़ती है। इस सबके चलते ब्रजभाषा सीमित होती जा रही है।

डाक्टर मधु भारद्वाज, लेखिका

पाठ्यक्रमों से रसखान, पदमाकर, घनानंद, दादू जैसे ब्रजभाषा के कवियों को हटा दिया गया है। हिंदी भाषा की किताबों में ब्रजभाषा का प्रतिनिधित्व पर्याप्त मात्रा में नहीं है। आजकल के कवि सम्मेलनों में भी ब्रजभाषा के कवियों को नहीं बुलाते हैं।

राज बहादुर, ब्रजभाषा के साहित्यकार

महत्वपूर्ण तथ्य

- यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में 6000 हजार भाषाएं बोली जाती हैं।

- वर्ष 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1561 भाषाएं बोली जाती थीं।

- 42.20 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं।

- 29 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें दस लाख से ज्यादा लोग बोलते हैं।

- 7 भाषाओं को बोलने वालों की संख्या एक लाख से अधिक है।

 

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