डीएपी की रैक आई, सुबह से पहुंचने लगेगी समितियों पर

रविवार को यमुना ब्रिज पर पहुंची रैक बोवाई का संकट दूर होने की उम्मीद

JagranSun, 17 Oct 2021 08:28 PM (IST)
डीएपी की रैक आई, सुबह से पहुंचने लगेगी समितियों पर

आगरा, जागरण संवाददाता। 20 दिन से सहकारी समितियों पर डीएपी के लिए हाहाकार मचा था, लेकिन उपलब्धता नहीं हो पा रही थी।

सरसों की बोवाई में पिछड़ रहे किसान समितियों के चक्कर लगा रहे थे। किसानों के लिए राहत भरी खबर है। रविवार रात को यमुना ब्रिज पर तीन हजार मीट्रिक टन डीएपी रैक लग चुकी है। सोमवार सुबह से सहकारी समितियों पर आपूर्ति शुरू हो जाएगी। डीएपी किल्लत के कारण निजी विक्रेता जमकर कालाबाजारी कर रहे हैं। 1200 रुपये वाले पैकेट पर 500 से 700 रुपये प्रति पैकेट अधिक वसूले जा रहे हैं।

जिले में 60 हजार हेक्टेयर में सरसों और 72 हजार हेक्टेयर में आलू की फसल होती है। सरसों की बोवाई का समय समाप्त हो रहा है, जबकि 15 अक्टूबर से आलू की बोवाई होनी थी। समितियों में डीएपी नहीं मिलने के कारण किसानों के सामने संकट खड़ा हो गया था। किसान रोज समितियों से बैरंग लौट रहे थे, जबकि बाजार में मनमाने दाम वसूले जा रहे थे। जिला कृषि अधिकारी विनोद कुमार ने बताया कि जिले को तीन हजार मीट्रिक टन की रैक प्राप्त हो गई है। सोमवार सुबह पांच बजे से ट्रकों के माध्यम से सहकारी समितियों पर आपूर्ति कराई जाएगी। किसानों को नहीं होने दी जाएगी मुश्किल: सांसद चाहर

भाजपा किसान मोर्चा राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सांसद राजकुमार चाहर ने केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री मनसुख मंडाविया से पिछले दिनों दिल्ली में मुलाकात की थी और आगरा के लिए दो निजी और एक सरकारी रैक मांगी थी। सांसद चाहर ने कहा कि किसानों को मुश्किल नहीं होने दी जाएगी। विभागीय अधिकारियों से वार्ता हो गई है, समितियों को डीएपी उपलब्धता में कोई देरी नहीं होनी चाहिए। कालाबाजारी कर रहे विक्रेता

डीएपी की किल्लत का फायदा निजी विक्रेता उठा रहे हैं और जमकर कालाबाजारी करने में जुटे हैं। एत्मादपुर के किसान राजेंद्र ने बताया कि विक्रेता उनकी पहचान के किसान को साथ लाने की बात कह रहे हैं। जब वह आश्वस्त हो जाते हैं कि उसके बाद प्रति पैकेट मोलभाव शुरू होता है। जितने पैकेट चाहिए होते हैं उस हिसाब से 500 से 700 रुपये तक अधिक पर डीएपी उपलब्धता कराई जा रही है। खंदौली के किसान हरपाल सिंह ने बताया कि सहकारी समिति पर डीएपी की उपलब्धता नहीं हो पा रही है। बाजार में निजी विक्रेता मनमाने दाम वसूल रहे हैं। इन पर लगाम भी नहीं कसी जा ही है।

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