Orphaned in Covid: जागरण की खबर को पढ़कर दिव्यांग बुआ की मदद को बढ़े हाथ

खंदौली के सैमरा गांव में रहने वाले किशोर के कोरोना संदिग्ध पिता की हो गई थी मौत। दस महीने की उम्र में हमेशा के लिए छोड़ गई थी मां आर्थिक संकट से जूझ रहा परिवार। बुआ भी बचपन में मिट्टी की ढाय के नीचे दबने से हो गई थी दिव्‍यांग।

Prateek GuptaWed, 23 Jun 2021 10:53 AM (IST)
अपने भतीजे के लिए मदद की आस में दिव्‍यांग बुआ बुलबुल।

आगरा, जागरण संवाददाता। करीब 14 साल से ओमवीर अपनी दिव्यांग बहन और नवीं कक्षा में पढ़ने वाले बेटे की जिम्मेदारी को अपने कंधों पर लेकर चल रहा था। पत्नी बेटे को दस माह की उम्र में छोड़कर चली गई थी। ओमवीर ने इकलौते बेटे को पढ़ाकर कुछ बनाने का सपना बुना था। कोरोना के लक्षणों से पीड़ित ओमवीर की डेढ़ महीने पहले मौत हो गई। इससे दिव्यांग बुआ के सामने भतीजे को अपने पैरों पर खड़ा करने का संकट पैदा हो गया। घर के आर्थिक हालात ऐसे हैं कि एक वक्त चूल्हा जल जाए, दाेनों के लिए यही बहुत बड़ी उपलब्धि है। दिव्यांग बुआ की इस पीड़ा को दैनिक जागरण में पढ़कर पंजाबी सभा महानगर आगरा ने मदद को हाथ बढ़ाए हैं। बुधवार को सभा की ओर से प्रदीप पुरी और रोहित कत्याल ने दो महीने का संपूर्ण राशन पीड़ितों के घर पहुंचा दिया है। आगे भी दवाई, बच्चे की किताबो की पूरी जिम्मेदारी भी उठाइ है। 

बता दें कि खंदौली के गांव सैमरा के रहने वाले ओमवीर वर्मा हलवाई का काम करते थे। उनकी उम्र करीब 35 साल थी। पत्नी करीब 13 साल पहले उन्हें हमेशा के लिए छोड़कर चली गई। एक बेटा है, जिसकी उम्र 14 साल है। ओमवीर शादी आदि कार्यक्रमों में पांच सौ रुपये दिहाड़ी पर काम करते थे। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के प्रकोप में उनका काम बंद हो गया। बहन बुलबुल ने बताया कि ओमवीर को एक मई को तेज बुखार के साथ खांसी और जुकाम हाे गया। सांस लेने में दिक्कत होने लगी। अस्पताल में भर्ती कराने के लिए रुपये नहीं थे। इसलिए डाक्टर को दिखाने के बाद घर पर ही रखकर दवा देते रहे।

बुलबुल ने बताया आठ मई को ओमवीर को सांस लेने में ज्यादा दिक्कत होने लगी। कोरोना के लक्षण होने के चलते उन्होंने जानने वाले भी उनकी मदद को आगे नहीं आए। दिव्यांग बुलबुल और 14 साल का बेटा ओमवीर को अस्पताल ले जाने का इंतजाम करते, तब तक उन्होंने दम तोड़ दिया। उनकी मौत से बेटे की पढ़ाई पर संकट मंडरा रहा है। बुलबुल ने बताया कि उन्हें दिव्यांग होने के चलते पांच सौ रुपये महीने सरकारी मदद मिलती है। मगर, यह रकम इतनी कम है कि वह दोनों एक वक्त की रोटी भी नहीं खा सकते। सरकार भतीजे की पढ़ाई का खर्च उठाने के साथ ही कुछ आर्थिक सहायता कर दे। इससे भतीजे का कुछ बनने का सपना पूरा हो सकता है।

मिट्टी की ढाय गिरने से 14 साल पहले दिव्यांग हो गई थी बुलबुल

बुलबुल वर्मा ने बताया उनकी उम्र करीब 22 साल है। वह 14 साल पहले घर के आंगन में लिपाई के लिए गांव के बाहर पोखर में मिट्टी की खोदने गई थीं। मिट्टी खोदने के दौरान ढाय गिरने से उसमें दब गई थीं। आठ-दस फीट गहरे मिट्टी में दबी बुलबुल को ग्रामीणों ने रेस्क्यू करके सकुशल निकाल लिया था। बुलबुल कहतीं हैं कि उनकी जान तो बच गई, लेकिन इस हादसे के बाद वह फिर कभी अपने पैरों पर नहीं खड़ी हो सकीं। उनकी रीढ़ की हड्डी में दिक्कत होने से वह अब चल फिर नहीं सकतीं। 

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