वृंदावन धाम जो आईं फिर न लौटी अपने गांव, जानिए ब्रज के आश्रय सदनों में रहने वाली महिलाओं के भाव उन्हीं की जुबानी

पश्चिम बंगाल व अन्य राज्यों से आईं माताओं को नहीं भा रहा अपना गांव। बोलीं कोई भी सुविधा दे अब कान्हा का दर छोड़कर कहीं नहीं जाना। वृंदावन धाम के पांच आश्रय सदनों में करीब 550 निराश्रित माताएं हैं।

Tanu GuptaThu, 29 Jul 2021 09:46 AM (IST)
वृंदावन के महिला आश्रय सदन में बैठ आपस में बातचीत करतीं विभिन्न प्रांतों की माताएं।

आगरा, विपिन पाराशर। कहते हैं कि वृंदावन धाम जो आ गया, वह यहीं का होकर रह गया। वृंदावन की रज में वह अपनापन है, जो इसे माथे से लगाता है, इसी का होकर रह जाता है। पश्चिम बंगाल व अन्य राज्यों से वृंदावन में आकर बसीं विधवा और निराश्रित माताओं ने भी कान्हा से ऐसी प्रीत लगाई कि अब दुनियादारी से रीत ही छूट गई है। जीवन के आखिरी पड़ाव में वह अपने घर नहीं जाना चाहतीं बल्कि यहीं कान्हा की सेवा में गुजारना चाहती हैं। इसके लिए वह हर सुख-सुविधा छोड़ने को तैयार हैं।

दरअसल, दूसरे राज्यों से ज्यादातर निराश्रित माताएं जिंदगी के आखिरी पड़ाव में वृंदावन आ गईं। यहां पांच आश्रय सदनों में करीब 550 निराश्रित माताएं हैं। यहां के आश्रय सदनों में ही रहकर उन्हें सरकार से वृद्धावस्था पेंशन मिलती है और आश्रय सदन में ही रहने और खाने का इंतजाम है। कुछ माताएं मास्क और ठाकुर जी की पोशाक तैयार करती हैं। इसके लिए उन्हें निश्चित मेहनताना मिलता है। दशकों से कान्हा के घर में रह रहीं इन माताओं की अपने कान्हा से ऐसी प्रीत लगी है कि अब वह अपने गांव नहीं जाना चाहतीं। बीते दिनों पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी वृंदावन आदि स्थानों पर रह रहीं निराश्रित माताओं को बंगाल में पुनर्वासित करने का ऐलान किया था। 20 जुलाई को केंद्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने वृंदावन आकर आश्रय सदनों का निरीक्षण किया। यहां कहा कि वह केंद्र को पत्र लिखेंगी कि सभी राज्यों में शेल्टर होम बनाकर निराश्रित माताओं को वहां पुनर्वासित किया जाए। ये बात सुन माताएं विचलित हो गईं। वह तो कान्हा का दर छोड़कर कहीं जाना ही नहीं जाना चाहती है। वह तो सुबह-शाम भजन कीर्तन कर ही जीवन यापन करना चाहती हैं। ओडिशा की सुशीला बाई कई वर्षों से यहां रह रही हैं। कहती हैं कि यहां तो कृष्ण की भक्ति करनी है। भले ही यहां नमक से रोटी खा लूंगी। गांव में कोई कुछ भी देगा तो भी अपने कान्हा को छोड़कर नहीं जाऊंगी। पश्चिम बंगाल के नवद्वीप मायापुर निवासी अनीता बाई कहती हैं कि अब इस उम्र में वृंदावन छोड़कर भला कहां जाऊंगी। अब तो कृष्ण की भक्ति में मन लग गया है, सुविधा तो वहां भी नहीं। यहां जो भी सुविधा हैं, बहुत अच्छी हैं। झारखंड की कुटी जिला की देवंती देवी कहती हैं कि अब न तो गांव में मेरा कोई घर है और न ही परिवार में कोई बचा। अब तो कृष्ण की भक्ति ही जीवन का आखिरी सहारा है। ओडिशा की ही पुष्प देवी भी इन्हीं माताओं में शामिल हैं। कहती हैं कि वृंदावन जैसा तीर्थ छोड़कर अब कहीं नहीं जाना ।

पांच सौ वर्ष पुराना है इतिहास 

करीब पांच सौ साल पहले चैतन्य महाप्रभु वृंदावन आए और उन्होंने वृंदावन का पुन: प्रकाश करने को अपने अनुयायी भेजे। इसके बाद से पश्चिम बंगाल के श्रद्धालु यहां हर साल तीर्थ करने आ रहे हैं। तीर्थपुरोहित हरिओम शर्मा कहते हैं पश्चिम बंगाल में परंपरा बन चुकी है कि जो माताएं विधवा हो जाती हैं, उन्हें भक्ति के लिए वृंदावन भेज देते हैं। ऐसी माताएं वृंदावन में रहकर मधुकरी (भिक्षा मांगकर भोजन करना) कर और ब्रजवासियों की सेवा कर जीवन गुजारती हैं। इनके साथ दूसरे प्रांतों की भी माताएं यहां आ रही हैं। 

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