RTI: पुलिस की खटारा से खटारा गाड़ी दे जाती है 14 किमी प्रति लीटर तक का माइलेज

पुलिस की जीप चल रही हैं उधारी के डीजल से।
Publish Date:Mon, 26 Oct 2020 03:51 PM (IST) Author: Prateek Gupta

आगरा, यशपाल चौहान। क्या पुलिस की गाड़ी का डीजल पंप कंपनी स्पेशल बनाती हैं। अगर ऐसा नहीं है तो कंपनी को इस पर रिसर्च करनी चाहिए कि इनमें ऐसी क्या खूबी है कि गाड़ी पुरानी होने पर भी माइलेज पर कतई फर्क नहीं पड़ता। यह हम नहीं कह रहे। पुलिस की गाड़ियों के डीजल का हिसाब बोल रहा है। थानों की खटारा गाड़ियां भी 12 किमी प्रति लीटर और सीओ की गाड़ी 14 किमी प्रति लीटर का माइलेज दे रही हैं। दैनिक जागरण द्वारा मांगी सूचना के अधिकार के पूछे गए सवालों के जवाब कुछ यही बयां कर रहे हैं। जबकि हकीकत में इनकी रनिंग के हिसाब से देखें तो माइलेज इससे कई गुना अधिक निकलेगा।

पुलिस को हाईटेक किया जा रहा है। भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेंस की नीति पर जोर है। कई ऐसे मद थानों के लिए इसीलिए बनाए गए हैं। पेपर से लेकर अन्य खर्चे अब दिए जाने लगे हैं। इनके बहाने पहले थानों में भ्रष्टाचार किया जाता था। मगर, डीजल खर्च पर अभी अधिकारी ध्यान नहीं दे रहे। थानों की गाड़ियों की रनिंग और उनको मिलने वाले डीजल का हिसाब जानने के लिए दैनिक जागरण संवाददाता ने 17 जून को सूचना के अधिकार के तहत एसएसपी कार्यालय में प्रार्थना पत्र दिया था। इसमें थाना प्रभारी, सीओ और चीता मोबाइल की गाड़ियों की रनिंग और उनको मिलने वाले डीजल की जानकारी मांगी गई थी। नौ अक्टूबर को इसका जवाब मिला। इसमें बताया गया कि थानों में मौजूद थाना प्रभारियों की सरकारी जीप के लिए एक माह में 200 लीटर डीजल दिया जाता है। इनकी गाड़ियों की एक माह में रनिंग 2400 किमी रहती है। क्षेत्राधिकारियों व अन्य राजपत्रित अधिकारियों के वाहनों को 210 लीटर एक माह में दिया जाता है। इनकी एक माह में रनिंग तीन हजार किमी की रहती है। इन्हें वीआइपी ड्यूटी के लिए अलग से डीजल दिया जाता है। वहीं चीता मोबाइल की गाड़ियों की एक माह में रनिंग 2600 किमी रहती है। जबकि इनको एक माह में 60 लीटर डीजल दिया जाता है। पुलिस कार्यालय द्वारा दी गई इस जानकारी को सही मान लें तो थाना प्रभारी की गाड़ी का माइलेज 12 और क्षेत्राधिकारी की गाड़ी का माइलेज 14 किमी प्रति लीटर निकलता है। यह नई टाटा सूमो और महिंद्रा थार का माना जाता है। जबकि थानेां की गाड़ियां काफी पुरानी हो चुकी हैं। थानेदार दबी जुबान में बताते हैं कि उनकी गाड़ी 8 से 10 किमी प्रति लीटर का माइलेज देती हैं। रनिंग अधिक होने के कारण सरकारी डीजल तो माह के पंद्रह दिन होने पर ही खत्म हो जाता है।

गाड़ी की लागबुक से अलग हकीकत

पुलिस की गाड़ी की लागबुक से हकीकत अलग है। इसमें उतनी ही रनिंग दिखाई जाती है, जितनी को मानकर डीजल दिया जाता है। जबकि इससे कई गुना अधिक गाड़ियां चलती हैं। माह में चार दिन थानेदारों की गाड़ियां रात्रि चेकिंग पर निकलती हैं। हर रात को सौ किमी से अधिक रनिंग रहती है। गश्त, आरोपितों की गिरफ्तारी को दबिश, उन्हें कोर्ट में पेश करने और जेल तक पहुंचाने में भी डीजल खर्च होता है। आरटीआइ के जवाब में दी गई जानकारी से भी कम डीजल अब मिल रहा है। सूत्रों का कहना है कि अब थानेदार की गाड़ी के लिए 185 और चीता के लिए 30 लीटर डीजल प्रतिमाह मिल रहा है। शेष डीजल खर्च का इंतजाम थाना प्रभारी और क्षेत्राधिकारी अपने चालक पर छोड़ देते हैं या इधर-उधर से करते हैं।

 

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