Papankusha Ekadashi 2020: भूलकर भी न करें पापांकुशा एकादशी के दिन ये काम, हो सकता है भारी नुकसान

27 अक्टूबर को है पापांकुशा एकादशी का व्रत।
Publish Date:Sun, 25 Oct 2020 01:28 PM (IST) Author: Tanu Gupta

आगरा, जागरण संवाददाता। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का बड़ा महत्व है। हर माह के कृष्ण व शुक्ल पक्ष में एकादशी आती है। एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने के साथ ही निराहार रहकर व्रत भी रखा जाता है। हर एकादशी का जहां अपना ही महत्व होता है वहीं इसका नाम भी अलग होता है।  पापांकुशा एकादशी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। इस बार यह 27 अक्टूबर को है। मान्यता है कि अगर एकादशी व्रत किया जाए तो व्यक्ति अपने अशुभ संस्कारों को भी नष्ट कर सकता है। इस एकादशी का महत्त्व खुद भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। इस एकादशी पर भगवान पद्मनाभ की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। इस एकादशी को पापांकुशा क्यों कहते हैं इसके लिए भी एक कथा प्रचलित है जिसका सार यह है कि पापरूपी हाथी को इस व्रत के पुण्यरूपी अंकुश से वेधने के कारण ही इस एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी पड़ा है।पापांकुशा एकादशी के दिन मौन रहकर भगवद स्मरण किया जाता है। साथ ही भोजन का भी विधान है। अगर इस दिन भगवान की सच्चे मन से पूजा-अर्चना की जाए तो इससे व्यक्ति का मन शुद्ध हो जाता है। मान्यता है कि इस एकादशी के दिन अघर भगवान विष्णु और भगवान शिव की आराधना की जाए तो व्यक्ति को सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही बैकुंठधाम की प्राप्ति होती है।

पापांकुशा एकादशी का महत्‍व

यह व्रत बेहद महत्वपूर्ण होता है। यह एकादशी व्रती व्यक्ति को तो लाभ पहुंचाती ही है साथ ही दूसरों को भी लाभ प्राप्त कराती है। इस एकादशी के दिन विष्णु जी के पद्मनाभ स्वरुप की पूजा की जाती है। इससे व्यक्ति का मन शुद्ध होता है। यह व्रत करने से व्यक्ति अपने पापों का प्रायश्चित कर सकता है। मान्यता है कि पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से माता, पिता और मित्र की पीढ़ियों को भी मुक्ति प्राप्त होती है।

अगर इस दिन उपवास किया जाए तो यह बेहद उत्तम होता है। इस दिन शाम को सात्विक भोजन किया जाता है। इस दिन चावल का सेवन न करें। रात के दौरान पूजा कर व्रत खोलने का विशेष महत्व होता है। कोशिश करें कि व्रत वाले दिन किसी भी व्यक्ति पर क्रोध न करें। पापांकुशा एकादशी व्रत कथापौराणिक कथा के अनुसार एक बार विध्‍यांचल पर्वत पर एक बहुत ही क्रूर शिकारी क्रोधना रहा करता था। उसने अपने पूरे जीवन में सिर्फ दुष्‍टता से भरे कार्य किए थे।उसके जीवन के अंतिम दिनों में यमराज ने अपने एक दूत को उसे लेने के लिए भेजा।क्रोधना मौत से बहुत डरता था। वह अंगारा नाम के ऋषि के पास जाता है और उनसे मदद की गुहार करता है।इस पर ऋषि उसे पापांकुशा एकादशी के बारे में बताते हुए अश्विन माह की शुक्‍ल पक्ष एकादशी का व्रत रखने के लिए कहते हैं। क्रोध ना कर सच्‍ची निष्‍ठा, लगन और भक्ति भाव से पापांकुशा एकादशी का व्रत रखता है और श्री हरि विष्‍णु की आराधना करता है। इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी संचित पाप नष्‍ट हो जाते हैं और उसे मुक्ति मिल जाती है। 

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