कोरोना महामारी पर मोरारी बापू का विशेष संदेश, पढ़ें मानवता के 5 सूत्र

कोरोना महामारी में मिली हुई छूट का दुरुपयोग न करें। मन को धैर्य दें। मन को समझाएं। वह कहीं निराश हतोत्साहित न हो जाए। नियंत्रण करें दया करें सहन करें। प्रभु ने दिया हो तो दान करें। कोई वस्तु न दे सकें तो भी संवेदना कोई कम दान नहीं है।

Kartikey TiwariTue, 22 Jun 2021 10:05 AM (IST)
कोरोना महामारी पर मोरारी बापू का विशेष संदेश, पढ़ें मानवता के 5 सूत्र

श्रीरामचरितमानस को केंद्र में रखकर सब के विश्राम के लिए कह रहा हूं। मानस में स्पष्ट लिखा है: जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल। सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल।। परमात्मा का नाम संसार भर के बाहरी और आंतरिक यानी शारीरिक व मानसिक रोगों की सबसे बड़ी औषधि है। जो जिसे मानता हो, उसके नाम का स्मरण करे। साथ ही आज की जो भौतिक सुविधाएं हैं, जो दवाएं हैं, वैक्सीन लेना है, उन्हें लें। जिन नियमों को निभाना है, उन्हें भी बहुत गंभीरता से निभाएं। साथ ही हरि नाम लें। जो जिसे भी मानता हो।

कबीरा कुआं एक है पनिहारिन अनेक,

बर्तन न्यारे न्यारे पानी सब में एक।

परम तत्व का स्मरण करें। मुझे लगता है इससे आंतरिक ऊर्जा भी बढ़ेगी और दवाएं तो काम करेंगी ही। यह आध्यात्मिक ऊर्जा बहुत बड़ा फायदा देगी।

अस्तित्व का नियम है कि जिसका आरंभ होता है, उसका अंत होता ही है। यह शुरू हुआ है तो इसका अंत होगा ही। कब होगा, कैसे होगा, यह हमें पता नहीं, लेकिन होगा जरूर। ऐसा मैं हनुमान जी के चरणों में भरोसे के साथ एक साधु के नाते कह रहा हूं। इस महामारी में जिन्होंने अपने सगे संबंधी खोए हैं, वही उसकी पीड़ा जानते हैं। उन्हें क्या समझाएं। लेकिन आखिर में तो कहना ही पड़ता है :

होइहि सोई जो राम रचि राखा,

को करि तर्क बढ़ावै साखा।

अंत में तो हमें परम शक्ति की शरण में जाना ही पड़ता है। मैं उन्हें ढांढस देता हूं, अपनी श्रद्धांजलि प्रेषित करता हूं। मुझे लगता है कि यह जो काल चल रहा है, डेढ़ साल से जो कुछ भी आदमी झेल रहा है, नई-नई विपदाएं आ रही हैं, यह माहौल आदमी को मजबूत कर देगा और आदमी फिर से खड़ा होगा। देश, समाज फिर खड़ा होगा। बीमारी हार जाएगी और मानवता जीत जाएगी।

मानव, दानव और देव की परिभाषा उपनिषद में है। पितामह ब्रह्मा ने देव, मानव और दानव की परीक्षा के लिए 'द' अक्षर दिया और कहा, इसका अर्थ लगाओ। दानवों के लिए ब्रह्मा जी का संदेश था- 'दया' करो, हिंसा न करो। देवताओं को जो 'द' दिया, इसके पीछे शिक्षा थी कि तुम्हारे पास जो भोग हैं, उनका 'दमन' करो। थोड़ा नियंत्रण करो। थोड़ा संयम में रहो। हम मानवों को जो 'द' दिया था, उसका अर्थ था तुम्हारे पास है तो 'दान' करो। अपनी जरूरतों को ऐसे समय में कम करें, जैसा कोरोना के कारण आजकल चल रहा है। जितना संभव हो, दूसरों के लिए करें।

देश और दुनिया पुन: तन, मन और धन का आरोग्य प्राप्त करे, इसलिए हमारे देश में कोरोना से बचाव के लिए जो दिशा-निर्देश बताए जा रहे हैं, उनका सभी लोग ठीक तरह से पालन करें, यह आज की आवश्यकता है। इन दिनों संयम बरतने को मैं अनुष्ठान कहता हूं। यह तपस्या का पर्व है। इन अनुष्ठानी दिनों में हम दया करें, हम थोड़ी तपस्या करें। अपने आप को सम्यक बनाएं। मिली हुई छूट का दुरुपयोग करके फिर महामारी का और भोग न बनें। अपने मन को धैर्य दें। मन को समझाएं। वह कहीं निराश, हतोत्साहित न हो जाए। नियंत्रण करें, दया करें, दमन यानी सहन करें। प्रभु ने दिया हो तो दान करें। कोई वस्तु न दे सकें तो भी संवेदना कोई कम दान नहीं है। दूसरों के प्रति संवेदना रखें।

लोग मुझसे पूछते हैं कि बापू, आप चिंतित तो लगते हैं, मगर कोरोना से डरे हुए नहीं लगते। मैं कहता हूं- जिसको किसी कोने पर भरोसा है, उसे कोरोना से क्या डर लगेगा। कोई कोना पकड़ लो मेरे भाई-बहन। शायर फ़हमी बदायूंनी का शेर है :

कितना महफूज़ हूं मैं कोने में

कोई अड़चन नहीं है रोने में

कोरोना का एक अर्थ हो सकता है को-रोना यानी किसको रोना। जिसके पास कोना है, उसकी आंखों में दुनिया के लिए संवेदना होगी।

स्वामी शरणानंद जी के मानवता के मूल 11 सिद्धांत हैं। देश काल का दर्शन करते हुए इस विशेष परिस्थिति में 11 में से पांच सूत्र ले सकते हैं। पहला है विचार का प्रयोग अपने पर और विश्वास का प्रयोग दूसरों पर अर्थात न्याय अपने लिए और क्षमा दूसरों के लिए। सबल के साथ न्याय होना चाहिए, लेकिन असमर्थ के साथ क्षमा। दूसरा सूत्र है, दूसरों के कर्तव्य को अपना अधिकार मत समझो। दूसरों की उदारता को अपना सामथ्र्य मत समझो और दूसरों की निर्बलता को अपना बल मत समझो। तीसरा है, निकटवर्ती जनसमाज की यथाशक्ति क्रियात्मक सेवा करो। इस समय की परिस्थितियों में ये सूत्र बहुत महत्वपूर्ण हैं। अगर हम पांच व्यंजन खाते हैं तो उसमें से तीन कम करें और जिसके पास कुछ नहीं है, उस तक पहुंचाएं। मैं अपने जीवन में इसे उतारकर आप से बोल रहा हूं।

चौथा सूत्र यह है कि शरीर को श्रमी बनाएं, मन को संयमी बनाएं, बुद्धि को विवेकवान बनाएं। हृदय को अनुरागी बनाएं और अहंकार से मुक्त रखें। पांचवां है, सिक्के से वस्तु महान है, वस्तु से व्यक्ति महान है, व्यक्ति से विवेक महान है और विवेक से सत्य महान है। इस समय का सत्य यही है कि महामारी फैली है। ऐसे में जो भी करें, विवेक के साथ करें। एक-एक कदम विवेकपूर्ण हो। खुद तो स्वस्थ रहें ही, साथ ही किसी अन्य के अस्वस्थ हो जाने का कारण न बन जाएं, इसका भी विशेष ध्यान रखें।

प्रस्तुति : राज कौशिक

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