Ram Navami 2021: भये प्रगट कृपाला दीनदयाला... कुछ ऐसा था भगवान राम का जीवन

Ram Navami 2021: भये प्रगट कृपाला दीनदयाला... कुछ ऐसा था भगवान राम का जीवन

Ram Navami 2021 प्रभु श्रीराम का जीवन सदा से प्रेरक रहा है। जन-जन के मन में रमने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का पृथ्वी पर अवतरण सकारण था। गोस्वामी जी ने लिखा है विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।

Kartikey TiwariWed, 21 Apr 2021 09:50 AM (IST)

Ram Navami 2021: प्रभु श्रीराम का जीवन सदा से प्रेरक रहा है। कोरोना संकट के वर्तमान दौर में भी वह हमारे भीतर सत्साहस भरता है और इस संकट पर भी विजय पाने का सन्मार्ग बन जाता है। परिस्थितियों को दोष न देना और सत्साहस से बड़े से बड़े संकट का मुकाबला करते हुए उन्हें अपने पक्ष में कर लेने का सबक श्रीराम से ही सीखा जा सकता है।

जन-जन के मन में रमने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का पृथ्वी पर अवतरण सकारण था। गोस्वामी जी ने लिखा है : विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। उल्लेख मिलता है कि इक्ष्वाकुवंशीय अयोध्या के चक्रवर्ती राजा दशरथ ने चौथेपन में पुत्र-प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ किया, जिसके फलस्वरूप श्रीहरि के सातवें अवतार के रूप में श्रीरामचंद्र उन्हें पुत्र-रूप में प्राप्त हुए। एक मां के ममत्व की दृष्टि से रानी कौशल्या ने प्रगट हुए श्रीहरि के विशालकाय रूप को देखकर अनुरोध किया कि आप मेरे गर्भ से जन्म लेकर शिशु-लीला कीजिए। मेरे वात्सल्य-स्नेह की पूर्णता तो आपके बालरूप में ही संभव है। उसके पश्चात श्रीहरि कौशल्या की गोद में नवजात शिशु की भांति चैत्र मास के शुक्ल पक्ष, तिथि नवमी पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न की शुभ मुहूर्तबेला में श्रीराम का अवतरण हुआ। यही दिन चैत्र नवरात्र के पवित्र दिवस (नवमी) शक्ति उपासना-आराधना के विराम का भी होता है :

चैत्रे नवम्यां प्राक् पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ।

उदये गुरु गौरांश्चो:स्वोच्चस्थे

ग्रहपञ्चके।।

मेषं पूषणि सम्प्राप्ते लग्ने कर्कटाह्वये।

आविरसीत्सकलया कौशल्यायां पर: पुमान्।। (निर्णयसिन्धु)

तीनों लोक सहित अयोध्या इस तरह आनंदमग्न हो गई, जैसे वहां के प्रत्येक घर में राम पैदा हुए हों। हर घर दशरथ महल जैसा सज गया। फूलों से पथ सुशोभित हो गए। राजा दशरथ और रानियों ने तो नेकचार के रूप में हीरे-जवाहरात, माणिक, मोती लुटाकर अपनी प्रसन्नता को प्रजाजनों से साझा किया। कौशल्या सहित दो अन्य माताओं क्रमश: कैकेई से धर्मधुरीण भरत और सुमित्रा से साक्षात शेषनाग के अवतार लक्ष्मण और शत्रुओं का दमन करने वाले सबसे छोटे व सबके दुलारे भैया शत्रुघ्न ने जन्म लिया।

बालपन में श्रीराम की संसार के अन्य बच्चों जैसी अगणित बालसुलभ चेष्टाओं से दशरथ महल का कोना-कोना पुलकित हो गया। बाल राम व अनुज कुछ खाते, कुछ गिराते, गिरते-संभलते, फिर गिरते। रोने लगते, फिर दौडऩे की चेष्टा करते हुए पैरों में पैजनियों की छम...छ...म...छम् देख-सुनकर माता- पिता के हर्ष का कोई ठिकाना ही नहीं रहता।

ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां।

गुरु वशिष्ठ से दीक्षित श्रीराम कालांतर में आज्ञाकारी, शांत स्वभाव, आजान बाहु, विशाल वक्ष और धीरोदात्त नायक के समस्त गुणों से संपन्न चर्चा में तब आए, जब यज्ञरक्षा हेतु राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ राजा जनक की पुत्री सीता के स्वयंवर (विवाह) में जनकपुर पहुंचे और शिव-पिनाक भंग कर सियावर रामचंद्र कहलाये। वे आजीवन पिता, पुत्र, पति, भाई, सखा व प्रजा सहित समस्त प्राणीमात्र के प्रति समदर्शी, समर्पित व उदारमना महापुरुष के रूप में जाने जाते रहे। जीवन को साक्षी भाव से तटस्थ मुद्रा में देखते हुए कर्तापन और उपलब्धि का श्रेय लेने की दौड़ से वे हमेशा दूर रहे। परशुराम के क्रोध से विचलित हुए बिना हाथ जोड़कर अपना परिचय देते हुए कहा मेरा दो अक्षर का नाम राम है और आप परशुराम। मुझे अपना सेवक मानकर आज्ञा दीजिए।

कैकेई के दो वरदान, जिनमें स्वयं के लिए वनगमन का समाचार सुन वे सहर्ष तैयार हो गए तथा सबसे पहले आशीर्वाद लेने माता कैकेई के ही पास पहुंचे। अपनी अगणित विशिष्टताओं के फलस्वरूप तभी तो वे शीलगुण निधान मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं। रामकथा में वनवास-प्रसंग को मूलत: संसारी जीवों के अनेक उतार-चढ़ाव, उथल-पुथल और झंझावातों के बीच से संतुलन बनाकर निकलने के सांकेतिक निकष के रूप में ही ग्रहण करना चाहिए। खास तौर पर आज के समय में, जब कोरोना जैसी महामारी का तांडव दिखाई दे रहा है, ऐसे में प्रभु श्रीराम का वनवास प्रसंग हिम्मत देता है।

प्रभु राम वनवास के काल को सानंद जीते हैं तथा आभास कराते हैं कि अपने-अपने हिस्से का वनवास तो सबको स्वयं ही काटना पड़ता है। अपने हालात पर किसी को दोष न देना और सत्साहस से उसका मुकाबला करते हुए परिस्थितियों को अपने पक्ष में कर लेने का सबक तो उन्हीं से सीखते बनता है। कंटकाकीर्ण पथ पर आम व खास सब एक समान हैं। अपने कर्म व प्रारब्ध की गति पर पर सभी को तैयार रहना चाहिए, चाहे वह कोई भी हो। राम जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण व ग्रहणीय पक्ष यही है कि आप जीवन को दीन-दुखियों और हाशिये पर जी रहे लाखों लोगों के लिए प्रेरक कैसे बना सकते हैं, उनको मुख्यधारा में लाकर सम्मानित जीवन का उजाला कैसे प्रदान कर सकते हैं।

राम ने चौदह वर्ष के जंगल-प्रवास को इसी संकल्प के साथ जिया। चाहे वह केवटराज को अपने स्नेह से अत्यंत प्रिय बना लेना हो, चाहे जन्म-जन्म से हरिदर्शन की भूखी एकनिष्ठ सनेही-शबरी की कुटिया में जाकर उनके जूठे बैर को खाना हो या वानर जाति, जो एक शाखा से दूसरी शाखा पर उछलकूद करके जीवन गुजार देते हैं, उनसे मैत्री कर भार्या सीता की खोज व प्राप्ति का पूरा श्रेय उन्हें देने का हो। श्रीराम के यह भिन्न-भिन्न गुण, धर्म, जाति व संस्कृति के साथ सर्वग्राहकता अद्भुत और अनूठी है। कहा जाना चाहिए कि राजा न होते हुए भी उन्होंने सबको एक मंच पर अन्याय के विरुद्ध एकत्र कर लिया। लंकाधिपति को अयोध्या या अन्य राजाओं की सैन्य मदद से भी परास्त किया जा सकता था, परंतु राम जी ने ऐसा नहीं किया।

कारण स्पष्ट है कि उन्होंने बिखरी हुई जनशक्ति को सही दिशा दी। महाबली के घमंड को माटी में मिलाना गुणनिधान के उसी चिंतन का प्रतिफल है। राम रथविहीन हैं, वानरों की सेना के सहारे तापसवेषधारी हैं, सैन्य साजोसामान से वंचित हैं, किंतु स्त्री अस्मिता की लड़ाई के लिए जो साहस और इरादे की जरूरत होती है, उनमें भरी हुई है। राजाओं-महाराजाओं के ऐश्वर्यवादी जीवन से दूर केवल एक पत्नीव्रती हैं। पत्नी को सुरक्षित कैद से मुक्ति दिलाने हेतु रावण के एक लाख पूत सवा लाख नाती, ता रावन घर दीया न बाती की कहावत को उन्होंने चरितार्थ किया। सत्य की इसी स्थापना की पूर्ति के लिए ही तो उनका अवतार हुआ था। वे तभी तो जन-जन के प्रिय और आदर्श बन गए। जानकी के कंठाभूषण और प्रजापालक ऐसे कि प्रजा के सवाल खड़ा करने पर बिना देर किए उसी प्राणबल्लभा जानकी को त्यागने के लिए तत्पर हो गए। यह किसी और राजा-महाराजा के वश की बात नहीं, प्रजा को प्राणों की तरह मानने वाले प्रभु राम के चरित व दर्पण जैसे मानस का लिया कठोर निर्णय था।

संतोष कुमार तिवारी, रामकथा के अध्येता

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