चाणक्य नीति: राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं स्वाधीनता का दर्शन

चाणक्य नीति विकट परिस्थितियों में भी दृढ़ आत्मविश्वास एवं निरंतर पुरुषार्थ के माध्यम से चाणक्य ने अपनी उत्तम नीतियों के माध्यम से चंद्रगुप्त को राज सिंहासन पर बैठाया तथा राष्ट्र के स्वाभिमान स्वाधीनता तथा संस्कृति को स्थिरता एवं सुदृढ़ता प्रदान की।

Jeetesh KumarTue, 23 Nov 2021 11:15 AM (IST)
चाणक्य नीति: राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं स्वाधीनता का दर्शन

चाणक्य नीति: आचार्य चाणक्य विश्वप्रसिद्ध कूटनीतिज्ञ व अर्थशास्त्री होने के साथ-साथ आध्यात्मिक ग्रंथों के मनीषी, साधक एवं तपस्वी थे। ईसा से 300 वर्ष पूर्व ऋषि चणक के घर इनका जन्म हुआ। चणक का पुत्र होने के नाते इनको 'चाणक्य’ कहा गया। बाद में इनकी रणनीतिक चालों के कारण इन्हें 'कौटिल्य’ कहा गया, क्योंकि उनकी कुटिल चालें शत्रु की पकड़ में नहीं आती थीं। राजनीति की बिसात पर टेढ़ी-मेढ़ी चालों के खिलाड़ी होने पर भी वह सच्चे महात्मा तथा तपस्वी थे। तक्षशिला विश्वविद्यालय में रहकर उन्होंने आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया तथा उसी विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया। विश्वप्रसिद्ध रचना 'अर्थशास्त्र’ तथा 'चाणक्य नीति’ में इन्होंने अपने चिंतन को प्रस्तुत किया है। इन दोनों ग्रंथों में इन्होंने सूत्रों तथा श्लोकों के माध्यम से धर्म, अध्यात्म, राज व्यवस्था तथा लौकिक आचार-व्यवहार से जुड़ी जीवन उपयोगी सामग्री का वर्णन किया है। 'अर्थशास्त्र’ इनका विशाल ग्रंथ है। दर्शन ग्रंथों में अपनी बात को सूत्रों में कहने की अत्यंत प्राचीन परंपरा है। चाणक्य के सूत्रों में भी जीवन निर्माण की मूल्यवान सामग्री समावेशित है। आचार्य चाणक्य ने अपने संक्षिप्त नीति के सूत्रों में संपूर्ण विश्व शांति के स्वर्णिम तत्वों का उल्लेख किया है। उनका चिंतन वेदों का ही सार है।

अपने जीवन की साधना, तपस्या और आत्मबल के द्वारा चाणक्य ने राष्ट्रनिर्माण हेतु 'अर्थशास्त्र’ ग्रंथ की रचना की। अपने कुशल चिंतन एवं राजनीति के विशाल अनुभव से इन्होंने साधारण बालक को सम्राट चंद्रगुप्त बना दिया। विकट परिस्थितियों में भी दृढ़ आत्मविश्वास एवं निरंतर पुरुषार्थ के माध्यम से नंद वंश का समूल नाश करके चाणक्य ने अपनी उत्तम नीतियों के माध्यम से चंद्रगुप्त को राज सिंहासन पर बैठाया तथा राष्ट्र के स्वाभिमान, स्वाधीनता तथा संस्कृति को स्थिरता एवं सुदृढ़ता प्रदान की। आचार्य चाणक्य स्वावलंबन के पक्षधर थे अर्थात आत्मनिर्भरता वह केवल भौतिक रूप से या आर्थिक रूप से स्वावलंबन के साथ-साथ पारिवारिक व्यक्तिगत, आत्मिक, आध्यात्मिक स्वालंबन का भी चिंतन प्रस्तुत करते है।

स्वावलंबन की भावना को परिभाषित करते हुए वे कहते हैं कि-'अनालोक्य व्ययं कर्ता, अनाथ: नर: शीघ्रं विनश्यति।अर्थात जो व्यक्ति अपने साधनों एवं भौतिक शक्ति को बिना विचारे सामथ्र्य से अधिक खर्च करता है तथा जो असहाय अनाथ है दूसरे पर निर्भर है, ऐसा व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाता है। दूसरे पर निर्भर ऐसे व्यक्ति का समाज में कोई अस्तित्व एवं स्वाभिमान नहीं रहता। आचार्य चाणक्य का मानना था कि जब तक समाज का जनसाधारण व्यक्ति अभावग्रस्त तथा निर्धनता से ग्रस्त है, तब तक वह स्वावलंबन के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता। निर्धनता स्वावलंबन में सबसे बड़ी बाधा है। चाणक्य अपनी नीति में राजाओं को स्वाबलंबन हेतु संबोधित करते हुए कहते हैं कि 'सर्वाश्च सम्पद: सर्वोपाये परिग्रहेत्Ó अर्थात एक कुशल राजा का दायित्व है कि वह सभी प्रकार से अर्थात अपनी बुद्धि कौशल से सभी प्रकार की संपत्तियां साम-दाम-दंड-भेद आदि की नीति के माध्यम से प्रजा हेतु ग्रहण करे। अपनी प्रजा को स्वावलंबन के पथ पर ले जाना एक राजा का परम नैतिक दायित्व है। अभाव, निर्धनता, दयनीय दशा तथा समाज के लोगों में निराशा का भाव स्वावलंबन पथ की सबसे बड़ी बाधा है।

अखंड भारत बनाना आचार्य चाणक्य का स्वप्न था, परंतु उस समय राष्ट्र दयनीय स्थिति से गुजर रहा था। चारों तरफ राजनैतिक अस्थिरता, अराजकता तथा सामाजिक अशांति फैली हुई थी। सिकंदर भारत पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ रहा था और दूसरी और नंद वंश का अयोग्य शासक धनानंद भोग-विलास की जिंदगी व्यतीत कर रहा था। ऐसी विकट परिस्थितियों में चाणक्य ने चंद्रगुप्त को चुना और उसमें पराक्रम, शौर्य, वीरता तथा आध्यात्मिक आत्मबल का संचार किया और संपूर्ण भारत की बिखरी हुई शक्ति को एकत्रित किया। राष्ट्रीय स्वाभिमान, स्वाधीनता एवं संस्कृति की रक्षा हेतु आचार्य चाणक्य ने भीषण संकटों का सामना किया। इन्होंने सम्राट चंद्रगुप्त को क्षात्रबल एवं ब्रह्मबल के संतुलन एवं संगठन का मंत्र दिया। आचार्य का मानना था कि जिस राष्ट्र में पराक्रम, वीर योद्धा, शस्त्रों में पारंगत क्षत्रिय हों तथा उनके साथ साथ ब्रह्म शक्ति से युक्त मार्गदर्शन करने वाले अध्यात्मवेत्ता विद्वान हों, तो वह राष्ट्र कभी भी पराजित नहीं हो सकता। इतिहास साक्षी है कि जब-जब ब्रह्मशक्ति और क्षात्रशक्ति एक साथ मिलकर चलती हैं तो विश्व की कोई ताकत उन्हें नहीं रोक सकती। महाभारत के युद्ध में योगीराज श्रीकृष्ण ब्रह्मशक्ति के प्रतीक तथा अर्जुन आदि पांडव क्षात्रशक्ति से संपन्न होकर ही युद्ध में विजयी बने। आध्यात्मिक बल के पुंज गुरु समर्थ रामदास ने शिवाजी जैसा सेनानायक पैदा किया। मुनि वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसी आध्यात्मिक हस्तियों ने श्रीराम जैसा क्षत्रिय राजा तैयार किया।

राष्ट्र की सुदृढ़ता, स्थिरता हेतु आचार्य चाणक्य का चिंतन बड़ा गहन था। उन्होंने अपने नीति सूत्रों में कहा है कि राष्ट्र की अस्मिता आत्मगौरव को क्षति पहुंचाने वाले दुष्ट प्रवृत्ति के तत्वों का समूल नाश अनिवार्य है। वे लिखते हैं कि-'वि न इन्द्रो मृधो जहिÓ अर्थात जो आतताई एवं प्रजा को पीडि़त करने वाले हैं, उनका समूल नाश करो। प्रजा का सुख राच्य का मूल है। राष्ट्र में प्रबंध की अव्यवस्था के कारण ही उपद्रव एवं हिंसा होती है। आचार्य चाणक्य का चिंतन था कि 'अधमं गमय तमो यो अस्मां अभिदासतिÓ अर्थात जो राष्ट्र की स्वाधीनता, गरिमा एवं आध्यात्मिक संपत्ति के संहारक आसुरी तत्व हैं, उन्हें घोर अंधकार में पहुंचाओ। राष्ट्र के कर्णधार यदि भ्रष्ट हैं, सुशासन के ज्ञान से रहित हैं तो वहां की प्रजा भी सुखी नहीं रह सकती।Ó कुराज राच्येन कुत: प्रजा सुखंÓ। राजा के धर्मात्मा होने पर प्रजा भी धार्मिक आचरण करती है। राजा के पापी होने पर प्रजा भी पापाचरण में विलीन हो जाती है। राजा यदि उदासीन रहता है तो प्रजा भी उदासीन रहने लगती है। इसलिए चाणक्य ने राजा को जागरूक, कर्तव्यनिष्ठ होकर पूरी तत्परता के साथ प्रजा का पालन करने का आदेश दिया। आचार्य चाणक्य राष्ट्र शब्द को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि राष्ट्र केवल किसी भूखंड मात्र को नहीं कहते, जिसमें नदी, पर्वत विविध प्रकार की वनस्पतियां या पशु-पक्षी हों। अपितु राष्ट्र शब्द से संस्कृति, सभ्यता, परंपरा, भाषा, इतिहास इन पांचों विषयों का बोध होता है। यह मिलकर जिस भूखंड के अवयव बनते हैं, वही राष्ट्र कहलाता है।

चाणक्य का चिंतन था कि देश में जन्मे प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण का भाव रखना ही सच्ची राष्ट्र सेवा है। अपने नीति सूत्रों के माध्यम से आचार्य चाणक्य ने तत्कालीन सुप्त जनमानस के पटल पर राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं आत्मगौरव की भावना को जाग्रत किया। वेदों में वर्णित कलिष्ट मंत्रों की विचारधारा को चाणक्य ने युवा शक्ति को सही दिशा बोध करवाने हेतु अपने सरल श्लोकों एवं सूत्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया। देश के आत्मगौरव और आत्मस्वाभिमान को सुदृढ़ एवं अखंड रखने के लिए अनिवार्य है राष्ट्र की एकता एवं संगठन। चाणक्य का विचार था कि 'राष्ट्रीय एकता राष्ट्र रूपी शरीर में आत्मा के समान है। जिस प्रकार आत्मा से हीन शरीर प्रयोजनहीन हो जाता है, उसी प्रकार राष्ट्र भी एकता एवं संगठन के अभाव में टूट जाता हैÓ। आचार्य ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन चारों वर्णों को संगठित करने का प्रयास किया। उन्होंने अपेक्षित एवं अपमानित उस समय के आदिवासी एवं वनवासी लोगों को चंद्रगुप्त की सेना हेतु तैयार किया। चाणक्य का कहना था कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति पुरुषार्थी एवं कर्मशील हो। चारों वर्णों के लोग जाग्रत होकर चिरकाल से संचित उदात्त, धार्मिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय भावों के प्रतीक राष्ट्र के ध्वज को सदैव ऊंचा रखें।

आध्यात्मिक शब्दावली में उपदेश देते हुए चाणक्य लिखते हैं कि 'न अस्ति कामसमो व्याधि, न अस्ति मोहसमो रिपु:। न अस्ति कोपसमो वहनि, न अस्ति ज्ञानात परं सुखं।Ó कामवासना के समान कोई व्याधि नहीं है। मोह मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। क्रोध के समान कोई अग्नि नहीं है अर्थात क्रोध ही अग्नि है और ज्ञान से बड़ा कोई सुख नहीं है। मानव जीवन उपयोगी सूत्रों की चर्चा करते हुए चाणक्य लिखते हैं कि तृष्णा वैतरणी नदी के समान है, जिसमें से निकलना मनुष्य के लिए बड़ा मुश्किल है और संतोष, आत्मसंतुष्टि नंदन वन के समान है। जीवन में आत्मसंतुष्टि को इंद्र की वाटिका के समान सुख देने वाला कहा गया है। आत्मबल और आत्मचिंतन को आचार्य ने उन्नति का आधार स्तंभ माना है। आत्मस्वाभिमान और आत्मिक स्वाधीनता का मार्ग इन दोनों से ही प्रशस्त होता है। चाणक्य का कहना है कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी उन्नति के लिए आत्मचिंतन अवश्य करना चाहिए कि समय किस प्रकार का चल रहा है, मेरा मित्र कौन है, मेरी शक्ति कितनी है? ऐसा चिंतन मनुष्य को सचेत एवं सावधान करता है। बुद्धिमान व्यक्ति को अपनी इंद्रियों को वश में करके समय के अनुरूप अपनी क्षमता को ध्यान में रखकर अपने कार्य को सिद्ध करना चाहिए। चाणक्य कहते हैं कि इंद्रिय संयम से ही राष्ट्र का जनमानस अपने आत्मस्वाभिमान एवं आत्मिक स्वाधीनता और स्वावलंबन को सुदृढ़ रख सकता है।

देश के कर्णधार राजाओं को सावधान करते हुए चाणक्य कहते हैं कि-'राच्य मूलं इन्द्रियजय:Ó अर्थात राच्य का मूल इंद्रियों को अपने वश में करना है। प्रत्येक राष्ट्र उन्नति के पथ पर तभी अग्रसर हो सकता है, जहां के सर्वोच्च पदाधिकारी यदि अपनी इंद्रियों को वश में रखते हैं, उनके संयम से ही राच्य की सुख समृद्धि स्थिर रहती है।

उत्थान का मार्ग बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि -'विज्ञानेन आत्मानं सम्पादयेत्Ó अर्थात अपना कल्याण चाहने वाले प्रत्येक मनुष्य को भौतिक विज्ञान, आध्यात्मिक ज्ञान तथा व्यवहार कुशलता के गूढ़ ज्ञान को अपनी आत्मा में आत्मसात करना चाहिए। भौतिक विज्ञान से सांसारिक यात्रा तथा आध्यात्मिक ज्ञान से आत्मिक आनंद की यात्रा का मार्ग प्रशस्त होता है। ऐसी उत्कृष्ट शक्तियों से युक्त मनुष्य जीवन के हर पथ पर विजयश्री का आलिंगन करता है। ज्ञान-विज्ञान में निष्णात ऐसा मनुष्य ही स्वयं को जीत सकता है। ऐसे महामानव ही समाज और अपने स्वाभिमान एवं स्वालंबन को नया रूप प्रदान करते हैं। ऐसा श्रेष्ठ चिंतन जिस राष्ट्र की प्रजा में होता है, उस राष्ट्र का आत्मगौरव उसकी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक स्वाधीनता भी सदैव अमर रहती है।

नीति एवं अध्यात्म के धुरंधर विद्वान आचार्य चाणक्य के अर्थशास्त्र के स्वर्णिम सूत्रों में संपूर्ण राष्ट्र का कल्याण निहित है। चाणक्य के इस स्वर्णिम चिंतन में राष्ट्र के स्वाभिमान और स्वाधीनता के अमर तत्व समावेशित हैं।

आचार्य दीप चन्द भारद्वाज

आध्यात्मिक चिंतक एवं लेखक

 

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