Rajasthan Rain: ​​​​​खेत में खड़े होकर अच्छी बारिश और फसल के लिए किसान कर रहे तेजा गायन

Rajasthan नागौर जिले के किसान खुले आसमान के नीचे खेतों में खड़े होकर बारिश के लिए लोकगीत गाते हैं। यहां के किसानों का मानना है कि उनके गीत गाने से लोकदेवता तेजाजी महाराज प्रसन्न होंगे और फिर बारिश होगी।

Sachin Kumar MishraWed, 04 Aug 2021 03:12 PM (IST)
​​​​​खेत में खड़े होकर अच्छी बारिश और फसल के लिए किसान कर रहे तेजा गायन। फाइल फोटो

जागरण संवाददाता, जयपुर। राजस्थान में नागौर जिले के किसान खुले आसमान के नीचे खेतों में खड़े होकर बारिश के लिए लोकगीत गाते हैं। किसानों का मानना है कि उनके गीत गाने से लोकदेवता तेजाजी महाराज प्रसन्न होंगे और फिर बारिश होगी। लोक गीत "तेजा गायन" के समय किसानों के हाथ में छाता होता है। तेजाजी को प्रसन्न करने के लिए किसान मेघ मल्हार राग में "तेजा गायन" करते हैं । नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल और विधायक रूपाराम रावतिया का दावा है कि "तेजा गायन" को एक दशक पहले कैब्रिज यूनिवर्सिटी के एक चैप्टर में शामिल किया गया था। उन्होंने बताया कि "तेजा गायन" को 300 पेज की एक पुस्तक में संकलित करवा कर कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में लोकगीत अध्ययन के एक चैप्टर में शामिल किया गया है। अब स्टूडेंट्स इस पर पीएचडी कर रहे हैं।

इस बार अच्छी बारिश, फिर भी तेजा गायन

नागौर जिले में इस बार अच्छी बारिश हो रही है, लेकिन प्राचीन मान्यता है कि तेजा गायन से इंद्र देव खुश होते हैं। बारिश के साथ ही फसल भी अच्छी होती है। इस कारण लगातार दो दिन से नागौर जिले के खेतों में खड़े होकर किसान तेजा गायन कर रहे हैं। खींवसर में बुधवार को तेजा गायन करने वाले राम जाट, मनभर और रामण का कहना है कि लोकदेवता तेजाजी को खुश करने के लिए यह गीत गा रहे हैं। उम्मीद है कि इस बार बारिश के साथ ही फसल अच्छी होगी। मंगलवार को साथी किसानों के साथ खेत में खड़े होकर तेजा गायन करने वाले खाजूराम जाखड़ कहते हैं, पीढ़ियों से यह परंपरा चल रही है। हर वर्ष मानसून शुरू होते ही तेजा गायन करते हैं। उन्होंने बताया कि यह टेर राग में गाया जाता है। कुछ किसान पारंपरिक नृत्य भी करते हैं।

विधायक ने विधानसभा में गाया था लोकगीत

करीब तीन साल पहले भाजपा विधायक रूपाराम मुरावतिया ने विधानसभा में राग मेघ मल्हार की तर्ज पर तेजा गायन किया था। सभी विधायकों ने ताली बजाकर मुरावतिया की गायन शैली की तारीफ की थी। उन्होंने कहा था कि इस गायन पर देश व राज्य में शोध होना चाहिए। तेजा गायन की परंपरा 10वीं शताब्दी से चली आ रही है। 

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