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शहीद को मा ने सेहरा, बहन ने राधी बाध दी अंतिम विदाई

संवाद सहयोगी, पठानकोट : भारतीय सेना की 7 डोगरा रेजीमेंट के 20 वर्षीय सिपाही सौरभ कुमार अपनी 14 माह की ड्यूटी में ही शहादत का जाम पी गए। बीती 13 मई को चंडीगढ़ के पास चंडी मंदिर स्थित अपनी यूनिट के टावर पोस्ट पर ड्यूटी के दौरान पाव फिसलने से सौरभ बुरी तरह घायल हो गए थे। सिर पर गंभीर चोट लगने से वे कोमा में चले गए थे।

दस दिन तक सैन्य अस्पताल में उनका इलाज चला, लेकिन उनकी सासों ने साथ छोड़ दिया। सोमवार को उनके पाíथक शरीर को उनके पैतृक गाव भटोआ लाया गया। यहा पर पूरे सैन्य सम्मान से उनका अंतिम संस्कार हुआ। इससे पहले तिरंगे में लिपटी शहीद सौरभ कुमार की पाíथव देह जब गाव भटोआ पहुंची तो माहौल गमगीन हो उठा। इकलौते बेटे की पाíथव देह को देखकर मा मधु की करुणामई सिसकिया पत्थरों का कलेजा छलनी कर रही थीं। मा ने शहीद बेटे को सेहरा बाध व बहन डिंपल ने भाई की कलाई पर राखी बाधी तो हर आख नम हो उठी। 21 सब एरिया कमाडर की तरफ से एसएससी की 5371 बटालियन के नायब सूबेदार वाघ डीटी, शहीद की यूनिट 7 डोगरा के कमाडर कर्नल एस जचारिया की तरफ से नायब सूबेदार लछबीर सिंह, विधायक जोगिंदर पाल, शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव कुंवर रविंदर विक्की ने रीथ चढ़ाकर शहीद को सलामी दी। इस अवसर पर पूर्व विधायक सीमा कुमारी, शहीद के दादा रिटा. सूबेदार मोहिंदर पाल, दादी कमला देवी, चाचा सरबन कुमार,यूथ काग्रेस भोआ के प्रधान कुलजीत सैनी, ब्लाक समिति के चेयरमैन राज कुमार सिहौड़ा,काग्रेस के पूर्व जिला प्रधान संजीव बैंस, सरपंच सोहन लाल, नंबरदार बंसी लाल, दीपक सैनी, रमन सैनी, सिपाही विकास, सिपाही दिनेश कुमार, नायक संग्राम सिंह, नायक अमरीक सिंह, सिपाही कपिल देव आदि उपस्थित थे। शहीद के नाम पर बनेगा यादगार गेट

मौके पर मौजूद विधायक जोगिंदर पाल ने कहा कि वे इस दुख की घड़ी में शहीद परिवार के साथ खड़े हैं। शहादत का मोल कोई भी सरकार नहीं चुका सकती, मगर फिर भी पंजाब सरकार की तरफ से इन्हें हर संभव सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी। शहीद के नाम पर गाव में यादगार गेट का निर्माण करवाया जाएगा। पिता बोले-अभी तो उसके भर्ती होने की खुशियां भी नहीं मनाई थीं

शहीद सौरभ कुमार की चिता को उनके चाचा अर्जुन कुमार ने मुखाग्नि दी। श्मशानघाट में सिपाही सौरभ कुमार अमर रहे भारत माता की जय के जयघोष गूंजे। सौरभ कुमार के पिता अश्विनी कुमार ने नम आखों से बताया कि उनके जीने का सहारा चला गया। इकलौता बेटा 14 महीने पहले ही सेना में भर्ती हुआ था। अभी तो हमने उसके भर्ती होने की खुशिया भी अच्छी तरह नहीं मनाई थीं कि हमें गम के समुंदर में डुबोकर चला गया।

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