विनय और साधन जीवन निर्माण का मूल आधार

विनय और साधन जीवन निर्माण का मूल आधार
Publish Date:Mon, 26 Oct 2020 03:52 PM (IST) Author: Jagran

संवाद सूत्र,मलोट (श्री मुक्तसर साहिब)

विनय आत्मा का सहज गुण है। बिना विनय के तप और साधना की सिद्धि नहीं होती है। विनय मोक्ष का द्वार है। विनय से ज्ञान दर्शन चारित्र क्षमा सरलता सहजता सेवाभाव गुणों की वृद्धि होती है। विनय से अहंकार कठोरता द्वेष घृणा आदि दोष हैं। यह विचार पंजाब सिंहनी प्रदीप रश्मि ने एसएस जैन सभा में श्रद्धालुओं से कहें।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में गुरु का प्रमुख स्थान है और गुरु के प्रति विनय उसके जीवन के निर्माण का मूल आधार है। गुरु के विपरीत आचरण करने वाला गुरु के विरोधी विचार रखने वाला अविनीत होता है। मूर्ख पाप दृष्टि वाला शिष्य गुरु की हितकारी शिक्षा को भी अपने लिए कष्टकारी समझता है और विनीत शिष्य गुरु के कठोर अनुशासन को अपने लिए कल्याणकारी मानता है। दो पत्थर होते हैं एक पत्थर वह होता है जो मूर्तिकार के हाथों से मूर्ति का रूप लेकर के पूजनीय बनकर मूर्तिकार की कला को भी सफल कर देता है । दूसरा वह पत्थर होता है जो मूर्तिकार की सारी कलाओं को असफल कर देता है जो मूर्ति का रूप नहीं ले पाता। इसी प्रकार दो प्रकार के शिष्य होते हैं एक वह जो गुरु के अनुशासन को सफल करते हैं और एक जो गुरु के अनुशासन को असफल कर पत्थर के पत्थर ही रह जाते हैं। एक शिष्य ऐसा होता है अपने दुष्ट आचरण के द्वारा गुरु की दुर्गति कर देता है। एक शिष्य ऐसा होता है जो आपनी विनय से क्रोधी गुरु को भी शांतचित बना देता है। एक शिष्य पाप दृष्टि वाला होता है जो गुरु के अनुशासन को गुलामी के रूप में ग्रहण करता है। अविनीत शिष्य दुर्गति को प्राप्त करता है और विनीत शिष्य गुरु के सारे विद्या को प्राप्त कर सिद्ध बन जाता है।

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