प्रेम, करुणा व दया के मूर्ति थे स्वामी जी

प्रेम, करुणा व दया के मूर्ति थे स्वामी जी
Publish Date:Fri, 30 Oct 2020 05:10 PM (IST) Author: Jagran

संवाद सूत्र, मलोट (श्री मुक्तसर साहिब) डीएवी एडवर्डगंज सीनियर सेकेंडरी पब्लिक स्कूल द्वारा विद्यालय की प्राचार्य संध्या बठला के नेतृत्व में महर्षि दयानंद सरस्वती का निर्वाण दिवस मनाया गया। इसमें विद्यार्थियों व अध्यापकों द्वारा महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन से संबंधित अपने विचार तथा अनेक कविताएं व भजन प्रस्तुत किए गए। हवन भी किया गया जिसमें कोरोना महामारी को दूर करने की तथा देश वासियों के सुख-समृद्धि, आयु, ऐश्वर्य की कामना की गई।

प्राचार्य बठला ने कहा कि महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के महान चिंतक, समाज-सुधारक तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उन्होंने वेदों के प्रचार और आर्यावर्त को स्वंतंत्रता दिलाने के लिए मुंबई में आर्यसमाज की स्थापना की। उन्होंने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। वेदों की ओर लौटो'' यह उनका प्रमुख नारा था। स्वामी दयानंद ने वेदों का भाष्य किया । उन्होंने कर्म सिद्धांत, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा संन्यास को अपने दर्शन के चार स्तम्भ बनाया। उन्होंने ही सबसे पहले 1876 में स्वराज का नारा दिया । उन्होंने सती प्रथा,दहेज प्रथा, बाल विवाह , छुआछूत, जाति प्रथा जैसी कुरीतियों को समाज से छुटकारा दिलवाया। अछूत माने जाने वाली जातियों को ऊंचा उठाकर उनका खोया हुआ आत्म सम्मान वापस दिलवाया । स्वामी जी ने जहर देने वाले रसोइया जगन्नाथ को भी उन्होंने जीवनदान देकर नेपाल भगा दिया था। ऐसे थे स्वामी दयानंद जिनके दिल में प्राणी मात्र के लिए प्रेम , करुणा, दया का अपार सागर भरा हुआ था।

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