बिखरते परिवारों के बीच संघ का सहभोज, दिखा गया जीवन की नई राह

शरद पूर्णिमा की रात में धवल चांद की चांदनी में अमरत्व को प्राप्त खीर तो बहुत परिवारों ने खाई होगी। लेकिन यही खीर शहर के प्रतिष्ठित करीब 35 परिवारों ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्वावधान में शहीदी पार्क में आयोजित कार्यक्रम में एक साथ पंगत में बैठकर खाई तो हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति की झलक ही नहीं दिखी बल्कि संयुक्त परिवारों के संबंधों में मिठास एक दूसरे की ताकत के दर्शन हुए।

JagranFri, 22 Oct 2021 06:02 AM (IST)
बिखरते परिवारों के बीच संघ का सहभोज, दिखा गया जीवन की नई राह

जागरण संवाददाता, मोगा : शरद पूर्णिमा की रात में धवल चांद की चांदनी में अमरत्व को प्राप्त खीर तो बहुत परिवारों ने खाई होगी। लेकिन यही खीर शहर के प्रतिष्ठित करीब 35 परिवारों ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्वावधान में शहीदी पार्क में आयोजित कार्यक्रम में एक साथ पंगत में बैठकर खाई तो हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति की झलक ही नहीं दिखी, बल्कि संयुक्त परिवारों के संबंधों में मिठास, एक दूसरे की ताकत के दर्शन हुए। एक दूसरे के साथ परिचय, कुछ खेल, कुछ मस्ती, संस्कारों की बातें। इस सब में कम साढ़े तीन घंटे बीत गए। परिवारों को पता ही नहीं चला। कार्यक्रम खत्म होने का अहसास तब हुआ जब शहीदी पार्क से विदा होते समय वहां मौजूद हरियावल पंजाब के प्रांत संयोजक रामगोपाल से कुछ परिवार आकर पूछने लगे ये अगला कार्यक्रम कब होगा?

ये पूरा आयोजन भगवान वाल्मीकि जी के प्रकाशोत्सव व शरद पूर्णिमा को समर्पित था। इस मौके पर संबोधित करते हुए प्रांत गो सेवा प्रमुख चन्द्रकांत ने कहा कि आज परिवारों में धन दौलत की ऐसी होड़ लगी है कि अपने ही परिवारों का अस्तित्व खत्म करते जा रहे हैं। उच्च शिक्षा के नाम पर तो, कभी जाब के नाम पर बच्चों को अपने से दूर कर रहे हैं। अपने आप से कभी पूछकर देखें, मन तो आज भी कहता है कि आपका बच्चा शाम का भोजन आपके साथ करे। सोते हुए कुछ पल आपसे बातें करे, बातों में आप संस्कार दें। बच्चे आपके पैर दबाकर दिन भर की थकान दूर करें। ये सब पुरानी बातें हो चुकी हैं। आज बच्चे शिक्षा के नाम या जाब के नाम पर आपसे दूर हो चुके हैं। रात को बच्चे आप के साथ नहीं होते हैं, उनके साथ सोने की बजाय आप दवाओं के साथ सोते हैं। बीमारी को लेकर जीते हैं। हर तनाव को दूर करती है मां की गोद

प्रांत प्रमुख चन्द्रकांत ने कहा कि कभी सोचा है जो बच्चे आपकी ताकत बनने चाहिए थे, परिवार की ताकत बनने चाहिए, उन्हें आपने अपनों से दूर कर बीमारी को अपना बना लिया है। बच्चे अलग से तनाव में जीते हैं। क्या आपको नहीं लगता है बच्चा जब तनाव में होता है, तो कितना भी बड़ा हो जाय, मां की गोद में आकर लेटने मात्र से उसकी जिदगी का बड़े से बड़ा तनाव छू मंतर हो जाता है। बच्चा ऐसा करना चाहता है, लेकिन दूरियों के कारण कर नहीं पाता है। तनाव को दूर करने के जो तरीके अपनाता है, वह न आपके बच्चे के लिए अच्छा है न आपके परिवार के लिए। कोरोना काल में जो लोग संक्रमित होकर भी परिवार के बीच रहे, ठीक हो गए। जो अस्पताल में चले गए, उनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जो अस्पताल से लौटे ही नहीं। परिवार में रहने वालों को इसलिए कुछ नहीं हुआ वहां अपनों के साथ ने दवाओं से ज्यादा असर किया।चन्द्रकांत जब ये सीख दे रहे थे, हाल में मौजूद परिवार के सदस्यों की आंखों में दूर शहर में बैठे बच्चों के सपने तैर रहे थे। उन्हीं सपनों के बीच कब आंखों से भावनाओं का समंदर बनकर आंसू झरने लगे, पता ही नहीं चला। आंसुओं का सैलाब थमा तो मन को असीम शांति सी महसूस हुई। संयुक्त रूप से परिवारों खेलों में लिया हिस्सा

इससे पहले अंत्याक्षरी, देशभक्ति के गीत,कुर्सी गेम आदि मनोरंजक खेल सभी परिवारों ने मिलकर एक साथ खेले। इस कार्यक्रम में शामिल शहर के प्रमुख चिकित्सक, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, व्यवसाइयों ने महसूस किया कि साढ़े तीन घंटे चले इस कार्यक्रम में उन्होंने एक नया जीवन जी लिया।कार्यक्रम की खास बात ये रही कि हर परिवार अपने घर से भोजन बनाकर लाया था। एक व्यक्ति का अतिरिक्त भोजन था। बाद में सबने मिलकर एक दूसरे के भोजन का स्वाद लिया। सभी के सामने असीमित व्यंजन थे, जो किसी पंचतारा होटल से भी ज्यादा लजीज होने का अहसास करा गए।इस अवसर पर विजय कौशिक, डॉ मुकेश कोछर, जेपी सिगला भी मौजूद रहे।

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