रंजीत की याचिका खारिज, मनिदर कौर ही बनी रहेंगी सलीनां की सरपंच

रंजीत की याचिका खारिज, मनिदर कौर ही बनी रहेंगी सलीनां की सरपंच

मोगा शहर से सटे गांव सलीनां में 104 एकड़ जमीन को कब्जा मुक्त कराने की दिशा में बड़ी जीत हुई है। सचिव पंचायती राज विभाग ने भी बर्खास्त सरपंच रंजीत कौर की बर्खास्तगी के खिलाफ अपील खारिज कर दी है। उनके स्थान पर बनाई गई कार्यकारी सरपंच मनिदर कौर ही सरपंच बनी रहेंगी। वह लगातार पंचायत की 104 एकड़ जमीन खाली कराने के लिए पैरवी कर रही हैं।

Publish Date:Thu, 26 Nov 2020 06:32 PM (IST) Author: Jagran

सत्येन ओझा, मोगा

शहर से सटे गांव सलीनां में 104 एकड़ जमीन को कब्जा मुक्त कराने की दिशा में बड़ी जीत हुई है। सचिव पंचायती राज विभाग ने भी बर्खास्त सरपंच रंजीत कौर की बर्खास्तगी के खिलाफ अपील खारिज कर दी है। उनके स्थान पर बनाई गई कार्यकारी सरपंच मनिदर कौर ही सरपंच बनी रहेंगी। वह लगातार पंचायत की 104 एकड़ जमीन खाली कराने के लिए पैरवी कर रही हैं।

करोड़ों रुपये की यह जगह कब्जामुक्त कराने के लिए कांग्रेस विधायक डा. हरजोत कमल भी विधानसभा में आवाज उठा चुके हैं। हाईकोर्ट के आदेश पर वर्तमान में इस मामले की जांच एडीसी (विकास) सुभाष चंद्र कर रहे हैं। सुनवाई की अगली तिथि 30 नवंबर है।

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यह है मामला

साल 1954 में मुरब्बाबंदी में गांव के लोगों ने 862 कनाल 16 मरले जमीन (लगभग 104 एकड़) मवेशियों के चारागाह के लिए दान कर दी थी। रेवेन्यू रिकार्ड में जमीनें उनके असल मालिकों के नाम ही बनी रहीं। हालांकि कास्तकार के रिकार्ड में जमीन सार्वजनिक जमीन (कॉमन लैंड) का दर्जा मिल गया था।

पंचायत के नाम हो चुकी इस जमीन का विवाद करीब 30 साल बाद उस समय हुआ, जब पंचायत के लिए छोड़ी गई इस जमीन के एक तिहाई हिस्से की मालकिन रहीं सूरज कौर ने दान की गई अपने हिस्से की जमीन की गिफ्ट डीड एक संत को गांव के लोगों की भलाई का काम करने के लिए दान कर दी। संत ने ऐसा करने के बजाय जगह किसी को बेच दी। बाद में दान की जमीन पर कब्जे होते रहे।

गांव के पुरखों द्वारा दान की गई 104 एकड़ जमीन पर धीरे-धीरे कब्जा हो गया। वर्तमान में इस जमीन पर कब्जा एक सेवानिवृत्त आइएएस, राजनेता व संत आदि प्रभावशाली हस्तियों का है।

यह मामला तब सामने आया जब साल 2007 में तब जिला शिकायत निवारण कमेटी के सदस्य बने अजय सूद गोरा ने कमेटी में शिकायत की।

पंचायत साल 1982 में हाईकोर्ट में जमीन की मालिकी का केस हार गई थी। 2015 में दोबारा इस मामले को अजय गोरा ने हाईकोर्ट में केस दायर किया। इस केस में जस्टिस जसवंत सिंह ने पंजाब विलेज कामन लैंड एक्ट के सेक्शन-11 के तहत जमीन का टाइटल रेवेन्यू रिकार्ड के अनुसार स्पष्ट करने के निर्देश डीसी को दिए थे। यानी आदेश में कहा था कि क्या ये जगह कामन लैंड हैं या इसके अलग-अलग मालिक हैं।

उस समय की गुरपाल कौर भी टाइटल की मांग को लेकर ही हाईकोर्ट में गई थीं। बाद में पंचायत बदल गई। नई सरपंच रंजीत बनी थीं। इस बीच मामला हाईप्रोफाइल होने के चलते कांग्रेस विधायक ने भी इस मामले को विधानसभा में एक साल पहले उठाया था। तब राज्य के पंचायत मंत्री ने जमीन कब्जामुक्त कराने के लिए कामन लैंड एक्ट के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर करने का फैसला लिया था। इस बीच तत्कालीन सरपंच रंजीत कौर ने हाईकोर्ट से केस वापस ले लिया, मामला करोड़ों की संपत्ति छिनने का था। ऐसे में सरकार ने केस वापस लेने का फैसला करने वाली सरपंच व पांच सदस्यों को ग्राम पंचायत की सदस्यता से 2018 में बर्खास्त कर दिया। मनिदर कौर को कार्यकारी सरपंच बना दिया था।

मनिदर कौर ने सरपंच बनने के बाद गांव के हित में जमीन को कब्जामुक्त कराने के प्रयास शुरू कर दिए। इस बीच बर्खास्त सरपंच रंजीत कौर ने हाईकोर्ट में अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ चुनौती दी। हाईकोर्ट ने आदेश दिए कि उन्हें उनके पास आने के बजाय सचिव पंचायत के समक्ष जाना चाहिए। रंजीत कौर ने सचिव पंचायत सीमा जैन के समक्ष याचिका दायर की, लेकिन सीमा जैन ने भी 19 नवंबर को रंजीत कौर की याचिका रद कर दी। इस फैसले के बाद मनिदर कौर ही गांव की सरपंच बनी रहेंगी। जमीन के टाइटल को लेकर एडीसी कोर्ट में चल रहे मामले में अगली सुनवाई में वही पैरवी करेंगी। हालांकि रंजीत कौर प्रकरण के बाद सचिव पंचायत ने अब इस मामले में पैरवी के अधिकार पंचायत सचिव को दिए हैं, लेकिन पंचायत पंचायत सचिव के समर्थन में खड़ी है।

सरपंच मनिदर कौर ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि जमीन कब्जा मुक्त होती है तो गांव में कोई बड़ा सरकारी प्रोजेक्ट लगने का रास्ता साफ होगा, जिससे गांव की उन्नति के नए रास्ते खुलेंगे।

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