निगम हाउस की मंशा पर उठाए सवाल

नगर निगम को 50 लाख रुपये से ज्यादा के वित्तीय नुकसान पहुंचाने वाला मामला पंजाब सरकार के पास पहुंच गया है।

JagranFri, 03 Sep 2021 11:11 PM (IST)
निगम हाउस की मंशा पर उठाए सवाल

सत्येन ओझा, मोगा

नगर निगम को 50 लाख रुपये से ज्यादा के वित्तीय नुकसान पहुंचाने वाला मामला पंजाब सरकार के पास पहुंच गया है। अधिकारों का दुरुपयोग कर कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से नोटीफिकेशन से पहले ही पानी व सीवरेज कनेक्शन रेगूलर कर दिए गए थे। इस मामले में अधिकारियों को बचाने

के लिए इस पूरे मामले को रूटीन प्रक्रिया बता हाउस ने मंजूरी दे दी थी। मूल एजेंडे में प्रस्ताव शामिल करने के बजाय ये प्रस्ताव आउट आफ एजेंडा लाया गया था। हैरानी की बात है कि निगम के खजाने को आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाले इस प्रस्ताव पर निगम हाउस की बैठक में मौजूद एक भी पार्षद ने आवाज बुलंद नहीं की। मुख्य विपक्ष अकाली दल के ज्यादातर पार्षद सुखबीर की रैली में होने के कारण सदन में नहीं पहुंच सके थे, उन्होंने हाउस की बैठक के समय में परिवर्तन की मांग की थी, लेकिन समय बदला नहीं गया था। क्या है मामला

पंजाब सरकार ने आठ मार्च को पंजाब सरकार के सभी निगम कमिश्नरों को एक पत्र भेजकर टिप्पणी मांगी कि निकाय क्षेत्र में पानी व सीवरेज के बिलों को वन टाइम सेटलमेंट योजना के तहत निस्तारित कर दिया जाय। निगम के अधिकारियों ने इस पर अपनी कोई टिप्पणी भेजने के बजाय 18 मई तक पत्र दबाकर बैठे रहे। 18 मई को अचानक योजना लागू कर दी। टिप्पणी मांगे जाने वाले पत्र को इंस्पेक्टर से लेकर कमिश्नर तक किसी ने नहीं पढ़ा। पहले इंस्पेक्टर ने नोटिग लगाई, फिर सुपरिंटेंडेंट ने, बाद में एसई रंजीत सिंह ने अंत में तत्कालीन निगम कमिश्नर अनीता दर्शी ने स्कीम लागू करने को मंजूरी दे दी। स्कीम लागू करते ही 18 मई से लेकर धड़ाधड़ नए व पुराने लोगों के अवैध कनेक्शन को रेगूलर करने का काम शुरू कर दिया। निगम जहां एक क्लर्क के पास फाइल कई सप्ताह तक अटकी रहती है लेकिन ये नियम लागू होते ही 20 दिन में रिकार्ड 900 से ज्यादा अवैध कनेक्शन वैध कर दिए गए। नियमानुसार ये कनेक्शन वैध किए जाते तो निगम को 50 लाख से ज्यादा की आमदनी होती।

निगम सूत्रों का कहना है कि इस बीच पंजाब सरकार ने दो जुलाई को एक और पत्र भेजकर निगम कमिश्नर से पूछा गया कि अगर वन टाइम सेलटमेंट योजना लागू की जाती है तो निगम को कितना आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है, निगम अफसरों ने इस पत्र का सरकार को जबाव नहीं दिया, पत्र दबा दिया। क्योंकि वे तो स्कीम पहले ही लागू कर दिए, गलती का अहसास होने पर सात जुलाई को आनन-फानन में स्कीम बंद दी गई। सवाल खड़ा होता है कि ये रुटीन प्रक्रिया थी, निगम अधिकारी सही थे तो उन्होंने सात जुलाई को स्कीम बंद क्यों की, आठ जुलाई को जिन लोगों ने आवेदन किया, उन्हें योजना का लाभ क्यों नहीं किया गया, उनका क्या दोष था? गलती पर गलती

सरकार ने अन्य निगमों व निकायों से मिली टिप्पणी पर आर्थिक नुकसान के आंकलन के बाद 25 अगस्त को नोटीफिकेशन जारी कर दिया। सरकार का नोटीफिकेशन आने के बाद नियमानुसार निगम कमिश्नर इसे अपने आदेश पर ही लागू कर सकते हैं। एक बड़ी गलती पहले ही हो चुकी थी, इसलिए उसको सुधारने के लिए 25 मई को आए नोटीफिकेशन को हाउस की बैठक में पेश कर दिया, सरकार के आदेश थे 27 अगस्त से योजना लागू कर दी जाय लेकिन हाउस में नोटीफिकेशन पेश किए जाने के कारण अब सरकार से मंजूरी मिलने का इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि हाउस की बैठक में पास प्रस्तावों को मंजूरी के लिए सरकार को भेजने होते हैं, 21 दिन में सरकार को मंजूरी देनी होती है या नामंजूर करने होते हैं। 21 दिन तक सरकार कोई एक्शन नहीं लेती है तो हाउस में पास प्रस्ताव लागू स्वत: ही हो जाते हैं।

आरटीआइ एक्टिविस्ट सुरेश सूद ने इस मामले में स्पेशल सेक्रेटरी स्थानक सरकार को पूरा मामला भेजते हुए कहा कि ये भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला फैसला है। हाउस ने इस गंभीर मामले को दबाकर एक और बड़ी गलती की है। इसे मंजूर नहीं किया जाना चाहिए, अन्यथा सरकार के नोटीफिकेशन, नियम व आदेशों का कोई मतलब नहीं रहेगा, ऐसे तो कोई अधिकारी सरकार के आदेशों का इंतजार ही नहीं रहेगा, उन्हें मनमानी करने का मौका मिल जाएगा।

शिकायत में ये भी कहा गया है कि हाउस टैक्स प्रॉपर्टी टैक्स के साथ ही अवैध कालोनियों के वन टाइम सेटलमेंट में भी सरकार ने टिप्पणियां मांगी हैं, अगर वाटर एंड सीवरेज कनेक्शन को नोटीफिकेशन से पहले लागू किया जा सकता है तो फिर इन दोनों मामलों को क्यों नहीं।

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