पौने दो लाख हेक्टेयर रकबे को समतल कर डा. जसविंदर सिंह ने 50 फीसद पानी बचाया

। कृषि अधिकारी के रूप में जसविदर सिंह किसानी की सबसे बड़ी समस्या के समाधान के लिए जूझ रहे हैं।

JagranWed, 20 Oct 2021 10:26 PM (IST)
पौने दो लाख हेक्टेयर रकबे को समतल कर डा. जसविंदर सिंह ने 50 फीसद पानी बचाया

सत्येन ओझा.मोगा

आम तौर पर माना जाता है कि सरकारी सेवा में आने के बाद चाहे मुलाजिम हो या अधिकारी, काम करने की आदत नहीं रहती,लेकिन पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना से एमएससी एग्रीकल्चर करने के बाद कृषि अधिकारी बने जसविदर सिंह ने सरकारी मुलाजिमों व अधिकारियों के प्रति इस धारणा को झुठला दिया। कृषि अधिकारी के रूप में जसविदर सिंह किसानी की सबसे बड़ी समस्या के समाधान के लिए जूझ रहे हैं। उनके प्रयासों से पिछले साल जिले के पौने दो लाख हेक्टेयर रकबे में से एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र ऐसा था जहां पराली को आग नहीं लगी। हर दिन 10-12 घंटे तक काम करते हैं। जसविदर सिंह इसकी वजह बताते हैं कि वे अपने काम का आनंद लेते हैं, इसलिए कभी थकते नहीं। किसानों के ज्वलंत मुद्दों पर उनके साथ हुई बातचीत के पेश हैं अंश।

सवाल: लगातार नीचे जा रहा भूमिगत जल स्तर आज किसानी की सबसे बड़ी समस्या है,इसके लिए क्या उपाय कर रहे हैं?

जबाव : कृषि अधिकारी के रूप में मुझे जिले में नई तकनीक व नई योजनाएं किसानों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी मिली थी। मैंने देखा कि जिले भर में कुल पौने दो लाख हेक्टेयर रकबा है, जो लेवल में नहीं है। सबसे पहले कम्प्यूटराइज्ड ढंग से खेतों की लेवलिग काम काम शुरू किया, आज उन्हें ये कहते हुए खुशी हो रही है कि आज जिले का शत प्रतिशत रकबा लेवल हो चुका है, इससे करीब 50 फीसद पानी की बचत हुई है।

सवाल : सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद पराली को आग की घटनाएं बंद नहीं हो पा रही हैं?

जवाब: मोगा में जबसे रीपर एवं पराली को जमीन में दबाने वाले अन्य उपकरण आए हैं, तबसे ही लगातार वे किसान बैठकें कर रहे हैं। उन्हें पराली में आग न लगाने के प्रति जागरूक कर रहे हैं। ये बताते हुए मुझे खुशी हो रही है कि पिछले साल धान के सीजन में जिले में कुल रकबे में से एक लाख हेक्टेयर रकबे में पराली को आग नहीं लगी, इस साल ये रकबा और ज्यादा बढ़ जाएगा।

सवाल: फसली चक्र को अपनाने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही हैं, लेकिन अभी तक इसके सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ रहे?

जबाव: ऐसा नहीं है कि सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आए हैं, नई पीढ़ी कृषि की करियर के रूप में देख रही है। एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से निकलने वाले नौजवान फलों, सब्जियों को नई तकनीक को अपनाकर बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह ठीक है कि धान का रकबा अभी बहुत ज्यादा कम नहीं हुआ है, लेकिन शुरूआत में युवाओं को फल, सब्जियों के उत्पादन से जिस प्रकार से परिणाम मिले हैं, अब वे बदलाव की दिशा में तेजी के साथ आगे बढ़ेंगे। नई पीढ़ी तकनीक को समझ रही है, यही वजह है कि वह कृषि को करियर के रूप में देख रही है, आने वाला समय अच्छा है।

सवाल : सरकारी दफ्तरों का ढर्रा अच्छा नहीं है, किसानों के लिए बनने वाली योजनाएं किसानों तक पहुंचती ही नहीं है, यही वजह है कि बदलाव के जो परिणाम आने चाहिए नहीं आ रहे हैं।

जबाव: मैं खुद किसानों के बीच में 12-12 घंटे रहता हूं। सरकार की हर योजना की जानकारी किसान बैठकों में देता हूं, खेतों में जाकर उन योजनाओं पर काम कराता हूं। सबके बारे में तो नहीं कह सकता, लेकिन सरकार की योजनाओं को किसानों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी जिले में मुझे मिली है, ये जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा हूं। इसी के चलते पंजाब सरकार भी मुझे राज्य स्तरीय अवार्ड से सम्मानित कर चुकी है, इससे काम करने के प्रति हौसला और ज्यादा बढ़ता है।

सवाल : 12-12 घंटे काम करके थकान नहीं होती?

जबाव: मैं अपने काम का आंनद लेता हूं, इसलिए कभी थकान महसूस ही नहीं की।

सवाल : सरकारी सिस्टम में रहते हुए भी इतने घंटे काम करने की प्रेरणा कहां से मिली ?

जवाब: मेरे परदादा संत बाबा कृपाल सिंह व दादा बलबंत सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, देश की आजादी के लिए काम किया। आज किसानों को सही दिशा ले जाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। परदादा व दादा जी के दिए संस्कारों पर चलकर ही अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी के साथ निभाने का प्रयास कर रहा हूं। सकारात्मक बदलाव होने तक इसी तरह काम करता रहूंगा।

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