बहुत किया व्यापार, अब सेवा में जुटे सुबेग सिंह, बठिंडा एम्स में रोज खिला रहे 1500 लोगों को खाना

सुबेग सिंह अब सेवा को जीवन का लक्ष्य बना चुके हैं। वह बठिंडा एम्स में इलाज के लिए आने वाले हर रोज 1500 लोगों को खाना खिला रहे हैं। वह एम्स के साथ दो एकड़ जमीन पर गुरुद्वारा व सरां भी बना रहे हैं।

Kamlesh BhattMon, 29 Nov 2021 04:01 PM (IST)
बठिंडा एम्स के सामने लंगर सेवा करते सुबेग सिंह। जागरण

जागरण संवाददाता, बठिंडा। एम्स में चेकअप करवाने के लिए आने वाले मरीजों के अलावा उनके परिजनों के लिए गांव जोधपुर रोमाणा के सुबेग सिंह लंगर की सेवा कर रहे हैं। वह यहां पर हर रोज 1500 लोगों को भोजन करवाते हैं। यहां तक कि उन्होंने एम्स के साथ अपनी तीन एकड़ जमीन पर गुरुद्वारा बनाने के अलावा सरां बनाने का भी काम शुरू कर दिया है।

दो साल पहले जब एम्स को शुरू किया गया था तो शुरुआती समय में यहां पर मरीजों की संख्या काफी कम थी। धीरे-धीरे चेकअप करवाने के लिए आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ने लगी। एक साल पहले सुबेग सिंह ने देखा कि यहां पर बहुत से लोग ऐसे हैं जो दूसरे शहरों से इलाज करवाने के लिए आते हैं। शहर से दूर होने के कारण उनको खाने की काफी दिक्कत आती है। इसके बाद उनके द्वारा यहां पर लंगर की सेवा शुरू की गई।

लंगर बांटते सुबेग सिंह। जागरण

सुबेग सिंह ने इसके लिए एम्स प्रबंधकों से बातचीत की। शुरुआती समय में उनके द्वारा 5 किलो आटे से लंगर शुरू किया गया था, जो अब 1 क्विंटल तक पहुंच गया है। यहां तक कि 5 लीटर दूध से पहली बार चाय बनाई थी, जो अब बढ़कर 100 लीटर हो गई है। इसके अलावा सुबेग सिंह द्वारा अपनी एम्स के साथ लगती तीन एकड़ जमीन पर गुरुद्वारा व सरां बनाया जा रहा है।

सुबेग सिंह का कहना है कि गुरुद्वारा बनाने का काम लगभग पूरा हो चुका है। अब सरां बनाने का काम शुरू किया जाएगा, जहां पर लोगों के ठहरने की मुफ्त व्यवस्था होगी। उनका कहना है कि वह लंगर को अपने घर पर ही तैयार करते हैं। इसके लिए सुबह 4 बजे उठकर काम करने लग जाते हैं, जबकि लंगर बनाने के लिए महिलाओं को भी काम दिया गया है, जिनको हर रोज दिहाड़ी दी जाती है। वह लंगर पर होने वाला सारा खर्च खुद के पैसों से करते हैं। सुबेग सिंह का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति एम्स में इलाज करवाने के लिए आता है तो उसको यहां पर ठहरने के लिए मुफ्त जगह दी जाएगी। सुबेग सिंह का कहना है कि उन्होंने पहले काफी व्यापार किया, लेकिन अब समाज सेवा करनी है।

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