पदम चंद महाराज ने विश्व कल्याण के लिए समर्पित किया संपूर्ण जीवन

भारतीय संत-परंपरा के प्रतिनिधि मुनि थे उत्तर भारतीय प्रवर्तक भंडारी पदम चंद्र महाराज। पर्याय और परंपरा से वे एक जैन संत थे परंतु परार्थ और परमार्थ की दृष्टि से वे सार्वजनीन और सार्वभौमिक महापुरुष थे।

JagranFri, 15 Oct 2021 07:33 PM (IST)
पदम चंद महाराज ने विश्व कल्याण के लिए समर्पित किया संपूर्ण जीवन

लुधियाना : भारतीय संत-परंपरा के प्रतिनिधि मुनि थे उत्तर भारतीय प्रवर्तक भंडारी पदम चंद्र महाराज। पर्याय और परंपरा से वे एक जैन संत थे, परंतु परार्थ और परमार्थ की दृष्टि से वे सार्वजनीन और सार्वभौमिक महापुरुष थे। जाति, धर्म संप्रदाय, ऊंच-नीच, देश प्रदेश आदि की परिधियों से उन्मुक्त रहकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव मंगल और विश्व कल्याण के लिए समर्पित किया। शिक्षा, चिकित्सा और व्यसन मुक्ति के लिए उन्होंने आजवीन अभियान चलाया। उनकी मंगलमय प्रेरणाओं से उत्तर भारत में सैकड़ों स्कूल, कालेजों, लाइब्रेरियों, अस्पतालों, और सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना हुई। श्रद्धेय गुरुदेव की प्रेरणा से स्थापित इन संस्थानों से आज हजारों लाखों लोग लाभान्वित हो रहे है।

गुरुदेव श्री भंडारी जी म. सा. का जन्म हरियाणा के हलालपुर गांव जिला सोनीपत में विजय दशमी के पावन पर्व सन 1917 को हुआ। जन्म से वे अग्रवाल कुल अवतंस थे। 18 वर्ष की आयु में जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट श्री आत्माराम जी महाराज के प्रशिष्य के रुप में उन्होंने जैन दीक्षा स्वीकार की। थोड़े ही वर्षों में वे जैन और जैनेतर दर्शन के अधिकारी विद्वान बन गए। सेवा, स्वाध्याय, धर्मप्रभावना, जन कल्याण आदि विविध गुणों के भंडार होने से आचार्य सम्राट श्री आत्मा राम जी म. सा. इनको भंडारी उपनाम से विभूषित किया गया।

सन 1986 में आचार्य सम्राट श्री आनंदऋषि जी म. सा. ने श्री भंडारी जी महाराज सा. को प्रवर्तक नियुक्त कर उत्तर भारत के श्रमण समाज का नेतृत्व करने का बृहद दायित्व प्रदान किया। यह निर्भा्रत सत्य तथ्य है। कि श्री भंडारी जी म. सा. के दिशा निर्देश में उत्तर भारत में जैन धर्म का महान उत्कर्ष हुआ। संघ और समाज को एक सूत्र में पिरोकर उन्होंने जिनशासन की उत्कृष्ट प्रभावना की। अनंत, गुण निधान, गुरुदेव भंडारी महाराज की 105वीं जन्म जयंती पर उनके चरणों में कोटि-कोटि नमन-वंदन। गुरुदेव श्री भंडारी के कार्यो का संक्षिप्त वर्णन

- उत्तर भारत के अनेक शहरों, कस्बों और गांवों में इन्होंने अनेक स्कूल और कालेजों का निर्माण कराया। दर्जनों अस्पतालों और डिस्पैंसरियों का निर्माण कराया। शताधिक स्थानकों का नव-निर्माण या जीणोंद्धार कराया। लाखों लोगों को व्यसनों से मुक्त करके सदाचारी जीवन का अनुयायी बनाया। शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए दर्जनों पुस्तकों का प्रकाशन कराके समाज में वितरण किया।

- इनकी प्रेरणा से लाखों बालक बालिकाओं को पुस्तके, पैन, कापी, स्कूल ड्रेस आदि उपलब्ध कराएं। यह पुनीत कार्य आज भी उनके शिष्यों और भक्तों द्वारा नियमित किया जा रहा है।

- एक ओर ऐतिहासिक कार्य गुरुदेव ने अपने शिष्य श्रृताचार्य उत्तर भारतीय प्रवर्तक श्री अमर मुनि महाराज सा. के सहयोग से संपन्न कराया। उन्होंने जैन शास्त्रों में प्राकृत, हिदी, और अंग्रेजी अनुवाद सहित प्रकाशित कराया।

- जैनागमों को वैश्विक स्वरुप में प्रस्तुत करना नि.संदेह एक अभूतपर्व कार्य है। प्रस्तुति- दक्षिण सूर्य डा. वरुण मुनि अमर शिष्य

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