दशहरा पर यहां रावण जलाया नहीं, पूजा जाता है.... जानें लुधियाना के पायल कस्बे की ये खास परंपरा

लुधियाना के पायल कस्बे में रावण फूंका नहीं बल्कि पूजा जाता है। डेढ़ सौ साल से इस स्थान पर रावण की पूजा होती है। यहां रावण का सीमेंट का पक्का बुत भी है। पुत्र प्राप्ति के लिए भी लोग यहां आते हैं।

Pankaj DwivediFri, 15 Oct 2021 04:37 PM (IST)
लुधियाना के पायल में रावण पूजन करते हुए स्थानीय लोग। जागरण

जासं, लुधियाना। दशहरे के मौके पर देशभर में रावण का दहन होता है लेकिन लुधियाना के पायल कस्बे में रावण फूंका नहीं, बल्कि पूजा जाता है। डेढ़ सौ साल से इस स्थान पर रावण की पूजा होती है। यहां रावण का सीमेंट का पक्का बुत भी है। खास बात यह है कि दशहरे पर विदेश में बसे दूबे बिरादरी के लोग भी परंपरा के अनुसार पायल आकर रावण पूजन करते हैं। बदलते समय के साथ इस बुत पर सांकेतिक रूप से शराब और बकरे का खून चढ़ाया जाता है। इस बुत पर पूजा करने की अलग-अलग मान्यता है लेकिन पुत्र की प्राप्ति के लिए भी लोग यहां पूजा के लिए पहुंचते हैं।

खास बात यह है कि यहां रावण के पुतले नहीं बनाए जाते, बल्कि डेढ़ सौ साल पहले बनाए गए सीमेंटे के बुत पर बाकायदा पेंट किया जाता है और उसे खूबसूरत रूप दिया जाता है। इस स्थान पर लगातार पूजा करने वाले अनिल दुबे की माने तो उनके पूर्वज हकीम बीरबल दास ने दो विवाह किए थे, लेकिन उन्हें औलाद नहीं हुई। दुखी होकर उन्होंने संन्यास ले लिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात एक संत से हुई, जिन्होंने उन्हें श्री रामलीला का आयोजन करने और परिवार के साथ जीवन बिताने के लिए प्रेरित किया। संत की बात मानकर वह परिवार में लौट आए और दशहरे के दिन उन्हें पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। उसी पुत्र ने बड़े होकर 1833 में पायल में श्री राम मंदिर का निर्माण करवाया और रावण के प्रति उनकी आस्था ने 25 फीट का बुत बनाने को प्रेरित किया। रावण का पक्का बुत बनाने की एक खास वजह यह थी कि भविष्य में आने वाली पीढ़ी भी रावण की पूजा करती रहे। उसी परंपरा के तहत यहां रावण फूंका नहीं, बल्कि पूजा जाता है।

एक बार लोगों ने तोड़ दिया था रावण का बुत

रावण की पूजा करने वाले श्रद्धालुओं की माने तो 1968 में कुछ लोगों ने इस बुत को ध्वस्त कर दिया था। लोगों का कहना था कि इससे शहर के विकास और तरक्की में बाधा आ रही है। बुत तोड़ जाने के बाद अच्छा खासा बवाल मचा और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने हस्तक्षेप किया और बुत का फिर से निर्माण करवाया। उसके बाद यहां लगातार पूजा हो रही है।

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