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अहंकार को छोड़ समर्पण करना सीखो : अरुण मुनि

अहंकार को छोड़ समर्पण करना सीखो : अरुण मुनि
Publish Date:Thu, 09 Jul 2020 07:51 PM (IST) Author: Jagran

संस, लुधियाना :

संघशास्ता शासन प्रभावक गुरुदेव श्री सुदर्शन लाल महाराज के सुशिष्य आगमज्ञाता गुरुदेव श्री अरुण मुनि महाराज ठाणा-6 एस एस जैन स्थानक सिविल लाइंस में सुखसाता विराजमान हो गए है। गुरुदेव अरुण मुनि म. ने कहा कि कभी- कभी झुकना भी सीखो। जैन धर्म का पुराना नाम विनय धर्म है। विनय का मतलब अहंकार को छोड़ कर स्वयं का समर्पण करना है। विनय तो संजीवनी बूटी है जो मुर्दे के अंदर भी जान डाल देती है। यदि कुछ पाना है तो उसके लिए आपको झुकना तो पडे़गा ही। रोटी खाने के लिए भी झुकना पड़ेगा, किसी से आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हो तो भी आपको झुकना है। पुराने समय में मंदिरों के प्रवेश द्वार छोटे बनाएं जाते थे, ताकि आने वाला धर्म स्थान में प्रवेश से पहले अपने आपको झुकाकर अंदर आए। कई धर्म स्थानों में लिखा होता है। अपने जूते यही उतारे, साथ में यही भी लिखवाना चाहिए कि जूते के साथ-साथ अपने अहंकार की टोपी भी यहीं उतारकर जाएं। अहंकारी व्यक्ति कभी किसी से कुछ प्राप्त नहीं कर पाता। विनय और समर्पण का भाव इंसान में एक बीज की तरह होना चाहिए जो अपने आप को मिटा कर मिट्टी में मिला देता है। उसी बीज से एक विशाल वृक्ष की रचना हो जाती है। विनय का गुण सर्वोपरि है। इससे ऊपर और कोई गुण नहीं है। दो तरह से चीजें सदा छोटी नजर आती है। एक दूर से दूसरी गुरुर से। अहंकारी इंसान को सारी दुनिया कीडे़ मकोड़े की तरह नजर आती है। अहंम को छोड़ोगे तो सदा अर्हम को पाओगे।

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