सुख की चाह में दुख को भोगना ही पड़ेगा : डॉ. रमेश मनि

सुख की चाह में दुख को भोगना ही पड़ेगा : डॉ. रमेश मनि
Publish Date:Thu, 01 Oct 2020 03:05 AM (IST) Author: Jagran

संस, लुधियाना : एसएस जैन स्थानक 39 सेक्टर में प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। रमेश मुनि महाराज ने कहा कि मानव जीवन को देव दुर्लभ कहकर पुकारा गया है। मानव जीवन पाने के बाद में भी सही धर्म श्रवण का सुअवसर मिलना ओर भी दुर्लभ है। सद धर्म श्रवण करने के बाद उस पर श्रद्धा और आचरण का होना तो बहुत ही दुर्लभ बात है। आज दुनिया में धर्म और मत मंत्राओं की कोई कमी नहीं। पर याद रखो मात्र मान्यता को ही धर्म समझना बड़ी अज्ञानता होगी। जो क्रिया पाप को नाश करे, मन में शांति और आनंद प्रदान करे। जो शांति से जिए और दूसरों सभी प्राणियों को भी अपनी आत्मा के समान मानकर उनकी रक्षा में सदा तत्पर रहे। वास्तव में ऐसा महान और श्रेष्ठ आचरण को ही धर्म कहा जाता है।

इस दौरान मुकेश मुनि ने कहा कि दुख आने के डर से घबराकर धर्म से विचलित न हो। दुख से ही सुख के महत्व को समझा जा सकता है। दुख एक कसौटी है। दुख किसी का दिया हुआ नहीं है। दुख आने पर यदि भागना भी चाहे तो भी भाग नहीं पाएंगे। जो कर्ज लिया है तो उसे चुकाना ही पडे़गा। जो कर्म बांधा है तो उसका फल भोगने के लिए मानव को सदा तत्पर रहना ही पडे़गा। सुख को चाहते है तो दुख भी भोगने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। पुरुषार्थ का अर्थ है सम्यग यत्न : राजेंद्र मुनि संस, लुधियाना : एसएस जैन स्थानक किचलू नगर में राजेंद्र मुनि व सुरेंद्र मुनि के सानिध्य में प्रार्थना सभा का आयोजन जारी है। राजेंद्र मुनि ने कहा कि विश्व के भिन्न-भिन्न चितकों ने अपनी-अपनी शब्दाबली में मानव जीवन को प्रशस्त करने का प्रयत्न किया है। अपने युग में भगवान महावीर भी इसके अपवाद नहीं रहे। उन्होंने मानव को पुरुषार्थ के स्थान पर देवी-देवताओं के आह्मन को प्रश्रय दिया था और स्वयं को पुरुषार्थ नगण्य हो गए थे। व्यक्ति पूजा जोरों पर थी। वाम मार्गियों का समाज पर प्रभाव था। आंतरिक पवित्रता का स्थान पाखंड ने ले लिया था। उन्होंने कहा हे जीव उठो, उठो पुरुषार्थ करो, तुम स्वयं अपने निर्माता हो।

सुरेन्द्र मुनि ने कहा कि पुरुषार्थ का अर्थ है-सम्यग यत्न। महावीर की ²ष्टि में पुरुषार्थ लौकिक अधिकार अथवा किसी एषणा का घोतक नहीं है, परंतु बंधनों से मुक्ति का मार्ग है। पुरुषार्थ व्यक्ति और समाज के समग्र विकास की उपलब्धि है। विकास चाहे आध्यात्मिक जगत में हो और चाहे लौकिक जगत में हो, इसकी सामान रूप से आवश्यकता होती है है।

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