Gurpurab 2021: गुरु नानक ने दुनिया को दिया सरबत के भले का मंत्र, 38 हजार मील की यात्रा करके जलाई मानवता की अलख

गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन में चार पड़ाव में यात्राएं की। सभी स्थानों पर उन्होंने परमात्मा एक है और हर इंसान में एक ही परमात्मा की ज्योत है का उपदेश दिया। चौथे पड़ाव में उन्होंने मक्का मदीना तक की यात्रा की।

Pankaj DwivediThu, 18 Nov 2021 01:42 PM (IST)
गुरुद्वारा संत घाट के पास बन रही मूल मंत्र इमारत। (फाइल फाेटाे)

हरनेक सिंह जैनपुरी, कपूरथला। विश्व भर को सद्भावना और सरबत के भले का संदेश देने वाले गुरु नानक देव जी ने किसी एक जगह डेरा जमाकर बैठने या गुरुद्वारा बनाकर स्थापित होने के बजाए समाजिक सरोकारों को तरजीह दी। उन्होने न केवल सिर्फ कर्मकांड व जात-पात के विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई बलकि नाम जपने के साथ साथ किरत करने और बांट कर छकने का उपदेश भी दिया। नारी को पुरुषों के बराबर सम्मान दिलाने, भूले भटकों को सही राह दिखाने और मानवता के सिद्धांत का प्रचार करने के लिए गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन में 38 हजार मील का सफर तय करते हुए चार यात्राएं की। इन्हें नाम नाम लेवा संगत उदासियों के तौर पर याद करती है। 

1500 ईसवीं में जाति व धर्म में बंटे समाज को एकजुटता का पाठ पढ़ाने के लिए गुरु नानक देव जी ने दर्जनों देश के कुल 248 प्रमुख नगरों का भ्रमण किया। उन्होंने रसातल में जा रहे समाज के कल्याण के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए। भाई मर्दाना को अपने साथ लेकर पहला प्रहार जाति बंधन पर किया। महिला को समानता का अधिकार दिलाने के लिए रब्ब को उलाभा देते हुए फरमाया ऐती मार पई कुरलाती, तै की दर्द ना आया। विश्व कल्याण के मद्देनजर गुरु जी ने चार पड़ाव में यात्राएं की। पहले चरण में वह 79 स्थानों पर मानवता का संदेश देने पहुंचे। दूसरे पड़ाव में गुरु जी ने 75 और तीसरे पड़ाव में 35 स्थानों तक पहुंच कर परमात्मा एक है और हर इंसान में एक ही परमात्मा की ज्योत है का उपदेश दिया। चौथी उदासी दौरान गुरु जी ने 59 स्थलों का सफर करते हुए 1521 में श्रीलंका के अनराधपुरा व मेनर से होता हुए यात्राएं समाप्त की।

श्री गुरु नानक देव जी की उदासियों का रुट।

पहली उदासी

गुरु नानक देव जी द्वारा इस सफर की शुरुआत 1500 ई. में श्री गोइदवाल साहिब, अमृतसर से छांगा-मांगा के जंगलों से इमनाबाद, गुजरावाला, होते हुए लाहोर व कसूर आदि पहुंचे। कसूर से सीधे पिहोवा, चूनिया, कुरुक्षेत्र, करनाल, हरिद्वार, नजीबाबाद, दिल्ली से होते हुए वृद्धावन पहुंचे और वहा से आगरा, मथुरा, अलीगढ़, कानपुर, लखनुऊ, अयोध्या, इलाहाबाद, प्रयाग, बनारस, जैनपुर, बकसर, छपरा, हाजीपुर, पटना से गया गए। वहा से राजगिरी, मंघेर, भागलपुर, साहिबपुर, राज महल, मालटा, परबतीपुर, लाल मीनार, गोहाटी, इंम्फाल, सिलवर, सिलहट, अगरतला, चिटगाव, चांदपुर, ढाका, फरीदपुर, शिवाज गंज, मुस्तफाबाद, किशन नगर, बालाघाट जबलपुर, चित्रकुट, सागर, भोपाल, चंदेरी, धौलपुर,, भरतपुर, जींद, कैथल, मलेरकोटला से होते हुए पांच साल बाद 1505 को वापस सुल्तानपुर लोधी पहुंचे।

दूसरी उदासी

गुरु जी ने सुल्तानपुर लोधी की धरती से दूसरी उदासी 1506 में आरंभ की। इस दौरान सबसे पहले वह बठिड़ा व सिरसा से होते हुए बीकानेर पहुंचे। वहां से जैसलमेर, जोधपुर, पुषकर, अजमेर, नसीराबाद, मारवाड़, देवगढ़, चितौड़गढ़, उज्जैन, आबू, पटन, अहमदाबाद, बासवाड़ा, जौड़ा, महिदपुर, इंदौर, हुसंगाबाद, रेनटेक, अमरावती, अकोला, बुलडाना, हिंगोली, बसमत, बिदर, गोलकंडा, हैदराबाद, विजयवाड़ा, गनटूर, अनंतपुर, कुडंपा, तीरुपति, मद्रास, अरकाट, पांडीचरी, कुंभकोनम, तंजोर, त्रिचनापली, रामेश्वर, ट्रिकोमाली (श्रीलंका), कन्या कुमार अंतरीप, त्रिवेद्रम, कोचीन, कोइंबटूर, कालीकट, मैसूर, बंगलोर, नरसिंह पुर, गोवा, धारवाड़, राजपुर, पूणा, बंबई, सूरत, बड़ोदा, भडोच, निमड़ी, जूनागढ़, सोमनाथ, द्वारका, मुंडरा, लखपत, अमरकोट, खानपुर, मिठनकोट, बहावलपुर, मुलतान, पाकपटन, तुलंबा, दीपालपुर, लाहोर से तलवंडी होते हुए 1509 ईसवीं को सुल्तानपुर लोधी वापस पहुंचे।

तीसरी उदासी

गुरु नानक देव जी ने 1514 ईसवी को तीसरी उदासी करतापुर से कलानोर, सुजानपुर, कांगड़ा से होते हुए पालमपुर पहुंचे और वहा से चंबा, कुल्लू, मंडी, रवालसर, रोपड़, देहरादून, मंसूरी, गंगोतरी, बदरीनाथ, अल्मोड़ा, राणीखेत, कोट दवार, नैनीताल, नानकमता, श्रीनगर, गोरखपुर, सीतामड़ी, काठमांडू, तमलोंग, मानसरोवर, लेह, खूतन, यारकंद, ताशकंद, किशतवाड़ा, भदरवा, वैषनोदेवी, रियासी, जम्मू, परमंडल से करतारपुर होते हुए 1516 ईसवी को वापस करतारपुर पहुंचते हैं।

चौथी उदासी

गुरु नानक देव जी ने 1518 ईसवी से अपनी चौथी उदासी करतारपुर से आरंभ की और पशरुर, वजीराबाद, कटास, ढकवाल, कालाबाग, डेरा इस्माइल खां, तख्ते-ए-सुलेमान, डेरा गाजी खां, जामपुर, फजलपुर, हनद, शखर, रोहड़ी, शिकारपुर, लरकाना, अमरकोट, संघव, हैदराबाद, (सिंध), देवल (कराची), हिंगलाज, अदनसना, मक्का, जद्दा, मदीना, येरुशलम, दमशक, पाराचिनार (पेशावर), गोरखहटड़ी, अलिप्पो होते हुए बगदाद पहंचे। वहां से इसफरान, तेहरान, मशहद, खवारिजम, बखारा, समरकंद, बलख, मजार, काबल, कंधार, जलाबलाबाद, जमरोद, पशौर, हसन अबदाल, इमनाबाद से श्री लंका से संबंधित बैटीकुला (मटीयकुलम), कुकूकल मंतप, कतरगामा, नूर, आहलियां, सीतावाका, अनुराधपुरा व मेनर से होकर वापस करतारपुर लौटे थे।

गुरु नानक देव जी ने 38 हजार मील पैदल चल कर समाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व धार्मिक रूप से गिर चुके इंसान को को एक अकाल पुरुख का उपदेश दिया। झूठी रीती रीविजों, वहिमों भ्रमों के जाल से निकल कर सच्चे धर्म की राह पर डालने का कार्य किया। एक परमात्मा के साथ जोड़ते हुए भाईचारक व साझीवालता का संदेश फैलाया।

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