मन की मैल को धोते हैं संतों के गंगा रूपी वचन: साध्वी रजनी

संस, लुधियाना: दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा सेखेवाल रोड स्थित मंथन स्कूल में चल रही तीन दिवसीय हरि कथा में भक्तों का सैलाब उमड़ा। आज की शुरूआत में साईं विद्या एजुकेशनल एंड कल्चरल सोसायटी के अध्यक्ष राजीव नागपाल, राजेंद्र कुमार, डॉ. अनिल कुमार द्वारा ज्योति प्रज्वलित कर की गई। इस अवसर पर साध्वी रजनी भारती ने कहा कि प्रभु का दरबार ही एक ऐसा दरबार है। जहां पर प्रत्येक इंसान की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम चरित मानस में कहा है कि संत चलते-फिरते प्रयाग राज हुआ करते हैं जैसे प्रयाग राज में नहाने से तन की मैल उतर जाती है, वैसे ही संतों के वचनों रूपी गंगा मानव मन की मैल को धो देती है। जब हम संतों का संग करते हैं। तो संत कृपा से व्यक्ति को चार फलों का ब्रह्मज्ञान मिलता है। यह ब्रह्मज्ञान ज्ञान क्या है? ब्रह्म अर्थात ईश्वर, ज्ञान अर्थात जान लेना। जब हम तत्व रूप से जान लेते हैं और उसकी निरंतर भक्ति करते हैं तो भक्त अपने जीवन शांति व आनंद का अनुभव करता है। यही ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया था गोस्वामी तुलसीदास जी ने। वह अपनी धर्म पत्नी रतना से बहुत प्रेम करते थे, परन्तु रतना ने उन्हें धर्म उपदेश दिया और कहा यदि प्रेम ईश्वर से किया होता तो ईश्वर मिल जाते। इन्हीं वचनों ने उन्हें भक्त बना दिया। ईश्वर की खोज करते-करते उन्हें एक पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ गुरु मिले श्री नरहरि दास जी जिन्होंने उन्हें वह ब्रह्मज्ञान प्रदान किया और इसी ज्ञान ध्यान साधना में रत श्री तुलसी दास गोस्वामी बन गए। उन्होंने श्री राम के जीवन चौपाइयों के माध्यम से संपूर्ण संसार के समक्ष रखा। आगे साध्वी जी ने कहा संसार में दो चीजें होती हैं एक प्रेम और एक मोह। हमारे संत कहते हैं प्रेम केवल उस ईश्वर से ही हो सकता है क्योंकि प्रेम में मिटना पड़ता है और मोह में तो प्रत्येक इंसान फंसा ही हुआ है। यदि हम भी ईश्वर को जानना चाहते हैं तो हमें भी प्रभु के तत्व रूप के दर्शन करने पड़ेंगे। तभी हमारे जीवन का कल्याण हो सकता है।

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