पीएम नरेन्द्र मोदी के आत्मनिर्भर मंत्र से मिली पंजाब के युवक को प्रेरणा, 12 लाख का पैकेज छोड़ ड्रैगन फ्रूट से बदली किस्मत

एक निजी कंपनी में 12 लाख रुपये सालाना पैकेज वेतन पर काम करने वाले पठानकोट के रमन सलारिया ने नौकरी छोड़ दी। पीएम नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर मंत्र को उन्होंने अपनाया और ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की।

Kamlesh BhattMon, 27 Sep 2021 04:26 PM (IST)
अपने बगीचे में खड़े रमन सलारिया। जागरण

विनोद कुमार, पठानकोट। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आत्मनिर्भरता के मंत्र से प्रेरणा लेकर पठानकोट के गांव जंगला के रमन सलारिया ने अपने साथ-साथ कई युवाओं की किस्मत बदल दी। 12 लाख के वार्षिक पैकेज वाली नौकरी छोड़ उन्होंने अपने गांव जंगला में दो वर्ष पहले ड्रैगन फ्रूट की बागवानी शुरू की थी। अब वह लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। रमन ने चार कनाल जमीन में ड्रैगन फ्रूट का बगीचा तैयार किया था। धीरे-धीरे अब वह ढाई एकड़ में बगीचा कर रहे हैं।

स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होने के कारण ड्रैगन फ्रूट की देश-विदेश में भारी मांग है। एक फल की कीमत 400 से 500 रुपये है, जिस कारण यह आम आदमी की पहुंच से बाहर है। रमन पठानकोट में इसे 200 से 300 रुपये प्रति पीस बेचते हैं। इसके अलावा अन्य राज्यों में भी भेज रहे हैं। गांव जंगला में इसकी अच्छी पैदावार हो रही है।

रमन सलारिया का कहना है कि इंजीनियर की नौकरी छोड़ने के बाद वह खुद का बिजनेस करना चाहते थे। उनके दिमाग में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आत्मनिर्भर मंत्र का विचार आया। उन्होंने लोगों को क्वालिटी वाली वस्तुएं बेचकर आजीविका चलाने की सोची। इसके बाद उन्होंने बागवानी का काम करने का का सोचा। साथ में चार अन्य युवाओं को भी जोड़ दिया।

रमन सलारिया के बगीचे में तैयार ड्रैगन फ्रूट। जागरण

रमन सलाारिया का कहना है कि वह 15 वर्षों से जेके सीआरटी नामक मुंबई-चीन आधारित संयुक्त उपक्रम में बतौर सीनियर इंजीनियर (सिविल) कार्यरत थे। दिल्ली मेट्रो के निर्माण में लगी कंपनी उन्हेंं प्रतिवर्ष 12 लाख रुपये वेतन देती थी। वह नौकरी तो इंजीनियरिंग की करते थे पर शौक किसानी का था। इस दौरान उनकी मुलाकात दिल्ली पूसा कृषि विश्वविद्यालय में कार्यरत दोस्त से हुई और ड्रैगन फ्रूट की पैदावार के बारे में जानने के लिए गुजरात जाकर जानकारी हासिल की।

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रमन को दोस्त विजय ने इसके बारे में बारीकी से जानकारी दी। उसके बाद वह दोस्त विजय के साथ गुजरात के भुज गए और वहां पर ड्रैगन फ्रूट के फार्म पर विजिट किया। रमन सलारिया बताते हैं कि ड्रैगन फ्रूट की सबसे पहले पैदावार उत्तरी अमेरिका से शुरू हुई। उसके बाद थाईलैंड, फिलीपींस, ताइवान, इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर में इसकी बड़े स्तर पर बागवानी हो रही है। पंजाब समेत कई राज्यों में उत्तरी अमेरिका और थाईलैंड से इसको मंगवाया जा रहा है। देश में गुजरात और महाराष्ट्र के किसान इसकी पैदावार कर रहे हैं। इसके बावजूद इसे विदेश से आयात करना पड़ रहा है। रमन सलारिया ने बताया कि दो साल में पांच लाख के करीब मुनाफा भी कमाया।

पानी की ज्यादा जरूरत नहीं 

इस पौधे को पानी की बेहद कम जरूरत होती है। पंजाब के माझा जोन का वातावरण इसके लिए अनुकूल है। ज्यादा पानी से पौधा गल जाता है। अच्छी पैदावार के लिए ड्रिप इरिगेशन बढ़िया विकल्प है। तीन साल बाद पौधा अपनी पूरी क्षमता के साथ फल देता है। फिर उसकी कलम काटकर नया पौधा रोपित किया जा सकता है या फिर इसे बेचकर कमाई भी की जा सकती है। मार्च में इसकी रोपाई होती है। जुलाई में फूल फूटकर फलों में बदलते हैं और सितंबर के पहले सप्ताह से अक्तूबर अंत तक इसके फल पक जाते हैं। यानी लगाने के आठ माह में ही यह फल देता है, लेकिन पूरी तरह से तैयार होने में इसे तीन साल लगते हैं।

देखा-देखी में और लोग लगा रहे पौधे

लोगों के लिए यह नया फ्रूट है। लिहाजा, इसकी मार्केटिंग भी उन्हेंं खुद ही करनी पड़ती है। रमन सलारिया ने कहा कि वह थोक में फल नहीं बेचेंगे और खुद खुदरा दुकान लगाएंगे। वहीं से इसकी बिक्री करेंगे। कहा विदेशी फल होने की बात कहकर बिचौलिए इसका रेट दोगुना कर देते हैं, लेकिन वह अपने शहर और जिले में इसे सस्ते दाम में लोगों तक पहुंचाएंगे। उनकी देखा-देखी में पठानकोट के विक्टोरिया इस्टेट के आनर सुधीर बंसल ने भी इसके तीस से अधिक पौधे लगाए हैं। इसके अलावा आने वाले बारह से पंद्रह दिनों में एसकेआर अस्पताल के मालिक हड्डी रोग विशेष्ज्ञ डाक्टर सुरेश ने भी बीस पौधे लगाने की बात कही है। क्षेत्र के तीन उच्च शिक्षा हासिल कर बिजनेस करने वाले युवा भी मिले हैं। उन्होंने इसकी खेती करने संबंधी जानकारी हासिल की है। उन्होंने जल्द ही ड्रैगन फ्रूट का कारोबार करने की बात कही है।

होम डिलीवरी की सुविधा

रमन ने बताया कि अगर कोई व्यक्ति दो किलो या इससे अधिक का आर्डर करता है तो वह उन्हेंं होम डिलीवरी फ्रूट भेजते हैं। कहा कि एक साल पहले जब उन्होंने अपना काम शुरू किया था तो 270 पिल्लर लगाए थे, जिन्हेंं बढ़ाकर अब 750 कर दिया है। एक पिल्लर पर चार प्लांट लगाए जाते हैं। पिछले साल उन्होंने 40 किवंटल के करीब फसल ली थी जो इस साल बढ़ कर 50 क्विंटल से ज्यादा हो गई है। आने वाले वर्षाें में यह और बढ़ेगी।

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