मोगा के परमवीर चक्र विजेता सूबेदार जोगिंदर सिंह को शहीदी दिवस पर किया याद, पुलिस टुकड़ी ने दी सलामी

मोगा के परमवीर चक्र विजेता शहीद सूबेदार की शहीदी दिवस पर शनिवार को कृतज्ञ जिला उनकी शहीदी को नमन कर रहा है। शहीदी दिवस पर डिप्टी कमिश्नर हरीश नायर ने जिला प्रबंधकीय काम्पलेक्स में लगी उनकी प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित किए।

Vinay KumarSat, 23 Oct 2021 03:24 PM (IST)
मोगा के सूबेदार जोगिंदर सिंह के शहीदी दिवस पर उन्हें याद किया। (फाइल फोटो)

मोगा [सत्येन ओझा]। परमवीर चक्र विजेता शहीद सूबेदार की शहीदी दिवस पर शनिवार को कृतज्ञ जिला उनकी शहीदी को नमन कर रहा है। डिप्टी कमिश्नर हरीश नायर ने जिला प्रबंधकीय काम्पलेक्स में लगी उनकी प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। इससे पहले पुलिस की टुकड़ी ने उन्हें सैन्य अंदाज में सलामी दी। इस मौके पर जिले के सभी विभागों के अधिकारी भी मौजूद थे।

कौन थे सूबेदार जोगिदर सिंह

26 सितंबर 1921 को जिले के गांव माहलां कलां में जन्मे जोगिंदर सिंह सिख रेजीमेंट में भारतीय सैनिक थे। 1962 के भारत चीन युद्ध में उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मनों के धक्के छुड़ा दिए थे। वे 1936 में ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हुए थे और सिख रेजीमेंट की पहली बटालियन में कार्यरत रहे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान वे नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) में तान्पेंगला, बुमला मोर्चे पर एक टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। दुश्मनों के साथ बहादुरी से मुकाबला करते हुए अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया तथा जब तक वह घायल नहीं हुए अपनी पोस्ट का बचाव किया। जोगिदर सिंह की पलटन के पास सिर्फ चार दिन का राशन था, जूते और कपड़े सर्दियों और लोकेशन के हिसाब से अच्छे नहीं थे।

हिमालय की ठंड में भी जोगिदर सिंह ने अपने साथियों का मनोबल बनाए रखा। पुरानी हो चुकी ली एनफील्ड 303 राइफल्स हाथों में थी। गोलियां कम थीं इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों से कहा था हर गोली का हिसाब होना चाहिए। जब तक दुश्मन रेंज में न आ जाए तब तक फायर रोक कर रखें, उसके बाद चलाएं, अपनी इसी चतुर रणनीति से उन्होंने चीनी सैनिकों को दो बार पीछे धकेला, उनकी संख्या सैकड़ों थी, आखिरकार अदम्य साहस का परिचय देते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए। 1962 में भारत सरकार ने उनकी बहादुरी के लिए उन्हें परमवीर चक्र देकर सम्मानित किया।

गांव माहलाकलां में जन्मे थे सूबेदार जोगिंदर सिंह

जिले के गांव माहलाकलां में किसान शेरसिंह व मां बीबी कृष्ण कौर के घर में 26 सितंबर 1921 को उनका हुआ था। 28 सितंबर 1936 को वे सिख रेजीमेंट में सिपाही के तौर पर भर्ती हो गए थे। कश्मीर में भी तैनात रहे जोगिदर सिंह ब्रिटिश इंडियन आर्मी के लिए जोगिदर सिंह बर्मा जैसे मोर्चों पर लड़े। भारत के आजाद होने के बाद 1948 में जब कश्मीर में पाकिस्तानी कबाइलियों ने हमला किया तो वहां मुकाबला करने वाली सिख रेजीमेंट का हिस्सा थे। अगस्त 1962 में जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने भारत पर हमला कर दिया था तब सूबेदार जोगिदर सिंह ने चीनी सैनिकों के दांत खट्टे कर दिए थे।

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