उत्तराखंड के युवा इंजीनियर शुभेंदु से विकसित देश सीख रहे जंगल उगाने की तकनीक, मोगा में 10 महीने में तैयार किया बाग

मोगा में श्री गुरुग्रंथ साहिब बाग के निकट ही दस माह में घना जंगल उगाने से पहले बठिंडा में भी लगा चुके हैं जंगल। ईको सिख संस्था के साथ मिलकर पंजाब के दूसरे जिलों के अलावा कनाडा अमेरिका व इंग्लैंड में उगा चुके हैं दो सौ से ज्यादा जंगल।

Pankaj DwivediTue, 21 Sep 2021 09:57 AM (IST)
युवा इंजीनियर शुभेंदु शर्मा की फाइल फोटो।

सत्येन ओझा, मोगा। उत्तराखंड के काशीनगर में जन्मे महज 36 वर्षीय और पांच फीट दो इंच कद वाले युवा इंजीनियर शुभेंदु शर्मा से भारत ही नहीं, बल्कि कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड व नीदरलैंड जैसे विकसित देश भी सीख रहे हैं कि कैसे परंपरागत पौधों से बने जंगलों में ही असली जीवन है। वे विदेशों में अब तक 200 जंगल लगा चुके हैं। परमाणु हमले के बाद तबाह हो चुके जापान को फिर से हरा-भरा बनाने के मकसद से जापानी प्रोफेसर डा. अकीरा मियां बाकी के साथ एक जंगल बनाने में काम करने के बाद बेंगलुरु में टोयटा कंपनी से नौकरी छोड़कर शुभेंदु बहुत कम जगह में प्राकृतिक व परंपरागत पौधों का घना जंगल उगाने में जुट गए हैं।

शुभेंदु सोमवार को यहां श्री गुरु ग्रंथ साहिब बाग के उद्घाटन के मौके पर पहुंचे थे। उन्होंने श्री गुरुग्रंथ साहिब में गुरु साहिबान की बाणी में दर्ज सभी 57 प्रकार के पौधों पर आधारित बाग के निकट ही मानव जीवन व पर्यावरण के लिए लाभदायक पौधों का घना जंगल सिर्फ दस महीने में ही उगा दिया। शुभेंदु ने बाग के पास ही एक हिस्से में 12 गुणा 12 मीटर के चार ब्लाक में सबसे मध्य में 80 फुट लंबाई तक जाने वाला पौधा लगाया। उसके चारों तरफ बेहद करीब उसके मुकाबले कम लंबाई के पौधे लगाए। इसी प्रकार की चार से पांच लेयर में पौधे पिछले साल अक्टूबर में रोपित किए थे। ये सभी पौधे औषधीय पौधों से संबंधित हैं। पौधे काफी करीब उगाने से उनकी जड़ें आपस में मिल गई हैं। कोई पौधा कमजोर पड़ता है तो दूसरे पौधों की जड़ों से उसे जरूरी पौष्टिक तत्व मिल जाते हैं। दस महीने में ही घना जंगल उग आया है। इससे पहले वे इसी प्रकार का जंगल बठिंडा जिले में भी उगा चुके हैं। पंजाब से उन्हें और भी कई प्रोजेक्ट मिले हैं, जिन पर वे काम कर रहे हैं।

क्यों नुकसानदायक हैं विदेशी व सजावटी पौधे

जो पौधे हमारे देश में परंपरागत ढंग से पैदा होते हैं, उनके फूलों से हवा के साथ बहने वाले परागकण हमारी सांसों से शरीर में चले जाते हैं। उन्हें पचाने के लिए हमारा शरीर सक्षम होता है, लेकिन विदेशी पौधों के परागकण को हमारा शरीर पचा नहीं पाता। हमारे जींस में ही ऐसा गुण नहीं मिला है। ये पौधे एलर्जी व सांस की बीमारियों का कारण बनते हैं। चिंता की बात ये है कि देश की नर्सरियों में नुकसान पहुंचाने वाले पौधे ही महंगी कीमत पर मिलते हैं। लोग उन्हीं को पसंद भी कर रहे हैं, जबकि प्राकृतिक पौधे बहुत सस्ती कीमत में मिलते हैं।

केंद्र सरकार ने दिए दो प्रोजेक्ट

भारत सरकार ने शुभेंदु की कंपनी ए फोरेस्ट को दो प्रोजेक्ट दिए हैं, जिन पर वे काम कर रहे हैं। वह देश के 19 राज्यों (नार्थ ईस्ट के राज्यों को छोड़कर) में 200 से ज्यादा जंगल उगा चुके हैं। अब वे ईको सिख संस्था के साथ मिलकर कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड, नीदरलैंड में भी जंगल उगा रहे हैं।

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