जर्जर होता जा रहा है देश का सबसे पुराना बठिंडा का किला मुबारक, यहां रानी बुर्ज में कैद रही थी रजिया सुल्तान

बठिंडा के किला मुबारक की समय-समय की सरकारों की ओर से सुध नहीं लेने के कारण इसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। किले का काफी हिस्सा खंडहर का रूप धारण कर चुका है। बारिश और मजदूरों की कमी के कारण मुरम्मत का काम रुक गया है।

Vinay KumarThu, 21 Oct 2021 08:39 AM (IST)
जजर्र हालत में बठिंडा का किला मुबारक।

गुरतेज सिंह सिद्धू, बठिंडा। अपने भीतर 1900 वर्ष का इतिहास संजोए बैठे बठिंडा के किला मुबारक की समय-समय की सरकारों की ओर से सुध नहीं लेने के कारण इसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। किले का काफी हिस्सा खंडहर का रूप धारण कर चुका है। चाहे अब किले की मरम्मत का कार्य चल रहा है परंतु कई स्थानों पर वाहरी चहारदीवारी पर बने निगरानी बुर्ज खंडहर हो रहे हैं। हालात यह हैं कि बारिश और मजदूरों की कमी के कारण एक बार फिर किले की मरम्मत का कार्य रुक गया है। हर वर्ष बरसात में किले का कोई न कोई हिस्सा गिरता जा रहा है। शहर में स्थित धोबीघाट की तरफ बने इस किले की हालत तो बेहद नाजुक है। यहां कई स्थानों पर किले का एक बड़ा हिस्सा गिर चुका है। लोगों की उम्मीद के अनुसार किले को बचाने के लिए काम नहीं हो रहा है।

1900 वर्ष पुराना है किला

इतिहासकारों के अनुसार इस किले के राजा दाब ने 90-110 ई. में बनाया था। राजा विनय पाल के कारण इस किले का नाम विक्त्रमगढ़ पड़ा। उसके पश्चात राजा जैपाल ने किले का नाम जैपालगढ़ कर दिया। मध्यकाल में भट्टी राव राजपूत ने किले को नए सिरे से बनाया और किले का नाम भट्टीविंडा रखा। इसी कारण इस शहर का नाम भटिंडा और फिर बठिंडा पड़ा। 22 जून 1706 को गुरु गोबिंद सिंह जी ने इस किले में चरण डाले थे। महाराज करम सिंह पटियाला ने गुरु गोबिंद सिंह की याद में गुरुद्वारा साहिब बनाकर इस किले का नाम गोबिंदगढ़ रखा। बेगम रजिया सुल्तान 1239 से 1240 तक बठिंडा के इस किले के संमन बुर्ज में कैद रही थी। अब राज्य के पर्यटन विभाग की ओर से इस किले का नाम बदल कर रजिया किला रख दिया गया है।

देखरेख के बावजूद बिगड़ रही हालत

केंद्रीय पुरातत्व विभाग की ओर से किले की मरम्मत शुरू किए जाने के बावजूद इस किला का प्राचीन रंग रूप लुप्त होता जा रहा है। देश के सबसे पुराने (करीब 1900 वर्ष)इस किले पर समय-समय के उतार-चढ़ाव आज भी यहां अंकित देखे जा सकते हैं। केंद्रीय पुरातत्व विभाग की ओर से किले को आधुनिक रूप तो दिया जा रहा है परंतु इसके साथ ही इसके ऐतिहासिक रूप भी बिगाड़ा जा रहा है। किले से मुख्य द्वार को ईंटों के पिलर बनाकर खड़ा किया गया है। विभाग के अनुसार साल 2002 से लेकर अब तक इस किले के संरक्षण पर करोड़ों रुपये खर्ज किए जा चुके हैं। मौजूदा सरकार के लिए इस किले को बचाना और इसके इतिहास को बनाए रखना चुनौती बना हुआ है।

किले की निगरानी के लिए बने चार बुर्ज हुए लुप्त

करीब 15 एकड़ में बने इस किले के इर्द-गिर्द 36 बुर्ज बने हुए है। इनकी ऊंचाई 118 फीट है। अब तक इसके चार बुर्ज को लुप्त हो चुके हैं। इन बुजरें पर हर समय पहरेदार किले का बाहर होने वाली हर गतिविधी पर नजर रखते थे। चूंकि किला बहुत ऊंचा बना हुआ है इस कारण बाहरी हलचल का सबसे पहले पता बुर्ज पर बैठे पहरेदारों को ही लगता था।

रानी बुर्ज में कैद रही थी रजिया सुल्तान

रानी बुर्ज (संमन बुर्ज) के नाम से जाने जाते बुर्ज में महिला शासक रजिया सुल्तान कैद रही। अब इसकी हालत बेहद खस्ता है। इस बुर्ज में की गई मीनाकारी और इसकी छत पर की गई चित्रकारी अपना असतित्व खो चुकी है। बुर्ज की छतों को चारों ओर से ईंटों के पिलर बनाकर बचाया गया है। बुर्ज के दरवाजे भी टूट चुके हैं।

निशान साहिब प्रिंस ली विलीयम ने किया था भेंट

किला मुबारक में महाराज करम सिंह की ओर से बनाए गए पहले गुरुद्वारा साहिब में सुशोभित निशान साहिब अंग्रेज शासक प्रिंस ली विलीयम ने भेंट किया था, जोकि आज भी इस याद को समेटे हुए है। किले में पुराने समय की चार तोपें अब भी यहां सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं।

मरम्मत जारी, पुराना रूप किया जाएगा बहाल : भानू प्रताप

पुरातत्व विभाग के कंजरवेटिव अधिकारी भानू प्रताप सिंह का कहना है कि किले की मरम्मत का कार्य चल रहा है। किले में काफी कामे हो चुका है और शेष रहते कार्य को भी जल्द पूरा कर लिया जाएगा। उन्होंने बताया कि अभी किले के रानी महल का काम चल रहा है। बारिश के कारण कुछ दिन के लिए कार्य बंद था अब जल्द ही किले को उसका पुराना रूप दिया जाएगा।

वर्ष घटना 90-110

राजा दाब ने किले का निर्माण करवाया

179-बठिंडा शहर भट्टी राव ने बसाया

1004 सुल्तान मुहम्मद गजनी का कब्जा

1045 -पीर हाजी रत्‍‌न यहां पधारे

1189 - सुल्तान मुहम्मद गोरी ने कब्जा किया

1191 - बादशाह पृथ्वी राज चौहान ने कब्जा किया

1240 - रजिया सुल्तान को नजरबंद किया गया

1515 - गुरु नानक देव जी यहां पधारे

1665 - गुरु तेगबहादुर जी यहां पधारे

1706 - गुर गोबिंद सिंह जी यहां पधारे

1835-40 - महाराज करम सिंह ने गुरुद्वारा साहिब बनवाया।

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