गेहूं को मंडी तक लाने में बढ़ रही लागत, किसान परेशान

गेहूं को मंडी तक लाने में बढ़ रही लागत, किसान परेशान

अप्रैल आधा बीत चुका है और खेतों में फसल तैयार है। सरकार ने 10 अप्रैल को मंडियों में गेहूं की खरीद की घोषणा कर दी है। धीरे धीरे फसल लेकर किसान बेचने जा रहे हैं। दो तीन दिन में फसल की रफ्तार मंडियों में पहुंचाने की और बढ़ेगी।

JagranFri, 16 Apr 2021 05:08 PM (IST)

सरोज बाला, दातारपुर

अप्रैल आधा बीत चुका है और खेतों में फसल तैयार है। सरकार ने 10 अप्रैल को मंडियों में गेहूं की खरीद की घोषणा कर दी है। धीरे धीरे फसल लेकर किसान बेचने जा रहे हैं। दो तीन दिन में फसल की रफ्तार मंडियों में पहुंचाने की और बढ़ेगी। किसानों को आस है कि फसल सही दामों में बिकेगी। लेकिन कंडी के किसान कुछ ज्यादा परेशान हैं क्योंकि पहाड़ी इलाकों में फसल उगाने से लेकर काटने व मंडी तक पहुंचाने में पहले से अधिक लेबर खर्च हो रहा है। कोविड-19 के चलते दूसरे राज्यों से मजदूरों का पंजाब में आना कम हो गया है। इसका असर फसल की कटाई पर पड़ रहा है। यदि इसके बावजूद लेबर मिली भी तो लागत मूल्य का हाल यह है कि आमदनी अठन्नी व खर्चा रुपया। एक तो बादलों की बेवक्त आवाजाही से परेशानी, दूसरा मजदूरों की किल्लत और मजदूरी महंगी। वैसे तो दूसरे राज्यों के मजदूर मिलते नहीं हैं, अगर मिल जाए तो नखरे उठाना नामुमकिन हो गया है। नखरे भी तो ब्लैक मेलिग तक पहुंच चुके हैं। किसान विनोद व जोगिदर ने श्रमिकों धन सहाय, मुकेश, राकेश, गुन्ना, बिल्ला व राधे श्याम से फसल काटने के बारे में बात की। पहले तो उन्होंने कहा कि एक सप्ताह तक व्यस्त हैं, फिर कहा कि यदि काम करवाना है तो प्रति एकड़ 6000 रुपये, दिन में तीन बार चाय व शाम को शराब की बोतल देनी होगी। निराश किसानों ने कहा, भाई हिसाब से पैसे ले लो तो उनका बुजुर्ग राधेश्याम बोला, एक रुपया भी कम नहीं होगा। कुछ मजदूर तो सात हजार रुपये प्रति एकड़ कटाई के मांग रहे हैं।

आमदन से ज्यादा खर्च

कंडी के किसान अब क्या करें। एक तो छोटे-छोटे खेत है, जहां कंबाइन से कटाई हो नहीं सकती। स्थानीय लोग अब कटाई में कोई रूचि नहीं रखते। किसान शक्ति सिंह, बलदेव सिंह व जुगल ने कहा कि खेती अब मुनाफे का नहीं, घाटे का धंधा बनकर रह गया है। उन्होंने कहा कि प्रति एकड़ कनक की फसल का खर्च आमदन से ज्यादा हो रहा है।

15,450 लग जाते हैं प्रति एकड़

कनक का बीज प्रति एकड़ - 1200 रुपये

ट्रैक्टर से जुताई तीन बार - 2500 रुपये

बिजाई के समय डीएपी खाद - 1250 रुपये

नाइट्रोजन और खपतवार नाशक दवाई - 900

येलो रस्टरोधी स्प्रे - 300

व्यय सिचाई अनुमानित - 1000

कटाई - 6000

गहाई क्रेशिग (ट्रैक्टर)- 1500

गहाई लेबर - 800

भाड़ा, लोडिग, लेबर को पालने का खर्च अलग

किसानों ने बताया, कनक को मंडीकरण के लिए ट्रैक्टर भाड़ा, लोडिग, लेबर की बिजाई-कटाई व गहाई के वक्त चायपान और दारू तक और लावारिस पशुओं द्वारा की जाने वाली हानि का आकलन किया जाए तो किसानों की दशा का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। नतीजतन किसान बढ़ी लागत से काफी परेशान हैं। किसानों ने कहा, ऐसे में आमदनी दोगुना करने के दावों और वादों पर भरोसा कैसे कर सकता हैं।

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