एकादशी व्रत करने से होती है पुत्र की प्राप्ति : जिंदा बाबा

एकादशी व्रत करने से होती है पुत्र की प्राप्ति : जिंदा बाबा

दातारपुर पौष मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी व्रत करने का विधान है। इस बार 24 जनवरी को पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जाएगा। इसे पवित्रा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह जानकारी दुर्गा माता मंदिर दलवाली में आध्यात्मिक विभूति राजिंद्र सिंह जिंदा बाबा ने दी है।

Publish Date:Sat, 23 Jan 2021 08:00 PM (IST) Author: Jagran

संवाद सहयोगी, दातारपुर

पौष मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी व्रत करने का विधान है। इस बार 24 जनवरी को पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जाएगा। इसे पवित्रा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह जानकारी दुर्गा माता मंदिर दलवाली में आध्यात्मिक विभूति राजिंद्र सिंह जिंदा बाबा ने दी है।

पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा के बारे में जिंदा बाबा ने बताया कि प्राचीन काल में भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम का राजा अपनी रानी शैव्या के साथ राज्य करता था। वह बड़ा धर्मात्मा राजा था और अपना अधिक समय जप, तप और धर्माचरण में व्यतीत करता था। राजा के द्वारा किया गया तर्पण पितर, देवता और ऋषि इसलिए नहीं लेते थे क्योंकि वह उन्हें ऊष्ण जान पड़ता था।

इन सबका कारण राजा के पुत्र का न होना था। राजा हर समय इस बात से चितित रहता था कि पुत्र के बिना वह देव ऋण, पितृ ऋण और मनुष्य ऋण से मुक्ति कैसे प्राप्त कर सकता है। इसी चिता से एक दिन राजा बड़ा उदास एवं निराश होकर घोड़े पर बैठकर अकेले ही जंगल में निकल गया।

वहां भी पशु पक्षियों की आवाजों और शोर के कारण राजा के अशांत मन को शांति नहीं मिली। अंत में राजा ने कमल पुष्पों से भरे एक सरोवर को देखा, वहां ऋषि मुनि वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे। राजा ने सभी को प्रणाम किया तो विश्वदेव ऋषियों ने राजा की इच्छा पूछी। राजा ने उनसे पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद मांगा।

ऋषियों ने राजा को पुत्रदा एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। राजा वापस राज्य में आया और उसने रानी के साथ पुत्रदा एकादशी का व्रत बड़े भाव से किया। व्रत के प्रभाव से राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिससे सभी प्रसन्न हुए और स्वर्ग के पितर भी संतुष्ट हो गए। शास्त्रों के अनुसार पुत्र प्राप्ति की कामना से व्रत करने वाले को पुत्र की प्राप्ति अवश्य होती है।

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पूजा का विधान

जिंदा बाबा ने कहा कि इस दौरान सुबह उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान करें। फिर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए विधि-विधान से पूजा करें। सबसे पहले घर में या मंदिर में भगवान विष्णु व लक्ष्मी की मूर्ति को चौकी पर स्थापित करें। इसके बाद गंगाजल पीकर आत्मा शुद्धि करें। फिर रक्षासूत्र बांधे। इसके बाद शुद्ध घी से दीपक जलाकर शंख और घंटी बजाकर पूजन करें और व्रत का संकल्प लें।

इसके बाद विधिपूर्वक प्रभु का पूजन करें और दिन भर उपवास करें। सारी रात जागकर भगवान का भजन-कीर्तन करें। दूसरे दिन सुबह भगवान विष्णु का पूजन पहले की तरह करें। इसके बाद ब्राह्माणों को भोजन कराएं और दक्षिणा दें। इसके बाद सभी को प्रसाद देने के बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें। ॐ गोबिन्दाय, माधवाय नारायणाय नम:, मंत्र का 108 बार जाप करें और हर बार मंत्र पढ़ने के बाद एक बेलपत्र भी भगवान शंकर को जरूर चढ़ाएं।

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