बटाला के गुरुद्वारा श्री कंध साहिब में हुआ था श्री गुरु नानक देव का विवाह

प्रथम पातशाही श्री गुरु नानक देव जी के 534वें विवाह पर्व पर यहां गुरुद्वारा श्री कंध साहिब तथा गुरुद्वारा श्री डेहरा साहिब में निरंतर श्री अखंड पाठ साहिब के साथ-साथ शब्द कीर्तन का आयोजन किया जा रहा है। श्री हरमंदिर साहिब से आए हुए रागी शब्द गायन कर सिख संगत को निहाल कर रहे हैं।

JagranSat, 11 Sep 2021 10:13 PM (IST)
बटाला के गुरुद्वारा श्री कंध साहिब में हुआ था श्री गुरु नानक देव का विवाह

जागरण टीम.बटाला : प्रथम पातशाही श्री गुरु नानक देव जी के 534वें विवाह पर्व पर यहां गुरुद्वारा श्री कंध साहिब तथा गुरुद्वारा श्री डेहरा साहिब में निरंतर श्री अखंड पाठ साहिब के साथ-साथ शब्द कीर्तन का आयोजन किया जा रहा है। श्री हरमंदिर साहिब से आए हुए रागी शब्द गायन कर सिख संगत को निहाल कर रहे हैं। वहीं हर्षोल्लास से मनाए जाने वाले वार्षिक पर्व बाबे का विवाह पर शगुन की रस्म निभाने के लिए शनिवार को लगभग तीन बजे गुरुद्वारा श्री सतकरतारियां साहिब में सुखमणि साहिब के पाठ के भोग डाले गए। अरदास करने के बाद शगुन लेकर नगर कीर्तन के रूप में जत्था सुल्तानपुर लोधी के लिए रवाना हुआ। 1917 में हुई विवाह पर्व मनाने की शुरुआत-

जगतगुरु श्री गुरु नानक देव जी का विवाह 1487 में बटाला में श्री मूलचंद खत्री तथा चंदो रानी की बेटी सुलखनी देवी से हुआ था। इस स्थान पर आजकल गुरुद्वारा श्री डेहरा साहिब मौजूद है। ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री कंध साहिब में श्री गुरु नानक देव जी की बारात बैठी थी, वो मात्र चंद कदमों की दूरी पर है। प्रसिद्ध पंजाबी लेखक कुलवंत सिंह खोखर ने अपनी पुस्तक बाबा नानक निवाजिया बटाला में इस पर्व का उल्लेख करते हुए कहा है कि सर्वप्रथम 1917 में रेलगाड़ी से अमृतसर से संगत बटाला रेलवे स्टेशन पर पहुंची। उस समय संगत को दारुल सलाम मोहल्ला (मौजूदा नाम प्रेम नगर) में स्थित शिवालय मंदिर में ठहराकर जलपान कराया गया। इसके बाद श्री गुरु ग्रंथ साहिब की छत्रछाया और पांच प्यारों की अगुआई में नगर कीर्तन रूपी बारात डेरा साहब के लिए रवाना हुई। बारात रूपी नगर कीर्तन की आज होगी वापसी-

शनिवार बाद दोपहर को बटाला से लगभग एक दर्जन वाहनों पर सवार सिख श्रद्धालुओं का नगर कीर्तन के रूप में जत्था शगुन लेकर श्री बेर साहिब सुल्तानपुर लोधी पहुंचा। जत्थे की वापसी रविवार सुबह गुरुद्वारा साहिब से होगी। इस दौरान बारात रूपी नगर कीर्तन का अलग-अलग जगह पर संगत द्वारा स्वागत किया जाएगा। नगर कीर्तन सुल्तानपुर लोधी से जालंधर-अमृतसर हाईवे, रइया मोड, बाबा बकाला साहिब, मेहता चौक से होता हुआ बटाला पहुंचेगा। कोरोना के चलते पिछले साल इस वार्षिक पर्व को मनाने की इजाजत नहीं दी गई थी। कच्चे घर में ठहराया था बारात को

बटाला में श्री गुरुद्वारा कंध साहिब गुरु नानक देव जी के विवाह के साथ जुड़ा हुआ है। बताया जाता है कि इसी जगह वर्ष 1487 में गुरु नानक देव जी का विवाह माता सुलखनी देवी से हुआ था। लड़की पक्ष के घर की जगह पर गुरुद्वारा डेहरा साहिब बना हुआ है। जोकि गुरुद्वाराकंध साहिब के पास ही है। ग्रंथों के अनुसार, गुरु जी के ससुराल वालों ने उस समय बारात को एक कच्चे घर में ठहराया था। इसकी दीवार आज भी वैसे ही खड़ी है। इसे शीशे के फ्रेम में रखा गया है। कैसे मिला गुरुद्वारा कंध साहिब को नाम-

गुरु जी उस समय कच्ची दीवार का सहारा लेकर बैठे थे। वधू पक्ष की एक बुजुर्ग महिला को लगा कि कहीं ऐसा न हो लड़कियां शरारत करके कच्ची दीवार को गिरा दें और दूल्हे को चोट आ जाए या वे बुरा मान जाएं। यह बात उन्होंने गुरुजी से कही तो वह मुस्कुराकर बोले, माता जी यह दीवार युगों-युग नहीं गिरेगी। इतिहास गवाह है कि पांच सौ वर्ष बीत जाने के बावजूद मिट्टी की वह कच्ची दीवार आज तक गुरुद्वारा श्री कंध साहिब में मौजूद है। फिलहाल इस दीवार को शीशे के केस में सुरक्षित कर दिया गया है। यहां माथा टेकने आने वाले लोग दीवार की मिट्टी उखाड़कर अपने साथ ले जाते थे। दरअसल लोगों में धारणा थी कि यहां की मिट्टी को गुरु जी के पवित्र हाथ लगे हैं और इसे खाने से रोग दूर हो सकते हैं। गुरुद्वारा साहिब में संगत की जानकारी के लिए लगाईं तस्वीरें -

गुरूद्वारा श्री कंध साहिब के प्रबंधकों द्वारा गुरुद्वारा श्री कंध साहिब में दीवारों पर श्री गुरु नानक देव जी के विवाह की बनाई गई तस्वीरें लगाई गई हैं। उन तस्वीरों के नीचे जानकारी दी गई है।

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